Saturday, 21 December 2013

वो एक दिन!

संस्मरण,
मेरी यादो का एक कोना
डॉ ये बात है तो काफी पुरानी। लेकिन याद मुझे आज भी है।
"क्यों?" डॉ ने पूछा।
"क्यूंकि वो दिन बहुत ज्यादा खराब था मेरे लिए। हर काम बिगढ़
रह। था। कुछ भी अच्छा नहीं हो रहा था।और उस दिन यूनिट टेस्ट
भी था तयारी कुछ थी नहीं मेरी।"
"पर तुम तो कभी किसी काम के लिए तयारी करते नहीं हो।"
"डॉ, यार तुम सवाल बहुत करते हो।"
"माफ़ करना लेकिन कल तुमने ही कहा था।"
"कहा तो था डॉ लेकिन समय के साथ सब बदलता है, आदतें भी।
डॉ तुम भी तो बदल गये हो। जब तुम यहाँ आये थे तो तब कैसे थे और
अब कैसे हो।"
"और तुम शाश्त्रार्थ बहुत करते हो।" डॉ ने कहा। "बहरहाल बात
उस विशेष दिन की हो रही थी"
"हाँ डॉ, उस दिन रोज की ही तरह सुबह सात बजे की ट्रेन
पकडनी थी सो छह बजे अपनी साइकिल उठाई और
सीधा पहुंचा SP की कोठी पर। गेट पर वही सिपाही ड्यूटी दे
रहा था जिसकी मेने काम्प्लेक्स पर दुर्गति की थी। राइफल उसके
कंधे पर थी लेकिन मुझ पर गोली वो अपनी आँखों से
चला रहा था था। खैर मेने उसका पांच मिनट इंतजार
किया लेकिन उसका दीदार नहीं हुआ। ट्रेन आने का समय
हो रहा था सो में दुखी मन से वहां से रुखसत हो लिया। स्टेशन
पहुँच कर साइकिल मेने स्टैंड पर खड़ी की और प्लातेफोर्म पर ट्रेन
और कपूर का इन्तजार करने लगा। कुछ देर बाद ट्रेन आ
गयी थी लेकिन कपूर नहीं आया। मेरी सहज बुद्धि ने तुरंत
सोचा की शायद उसने टेस्ट की वजह से छुट्टी कर ली है। मेरे मन में
भी विचार आया की में भी कर लूँ किन्तु कर न सका।
खैर ट्रेन आ गयी थी और जाना था ही सो मै ट्रेन पर सवार
हो गया। मन व्यथित था इसलिए दैनिक सवारियों से अलग
बैठा था।
मथुरा तक का सफ़र सही सलामत हो गया था। मथुरा जंक्शन पर
पहुँच कर मित्रों से मुलाकात की। ताज एक्सप्रेस के आने में
अभी 15 मिनट बाकी थे कि डॉ अचानक प्लेट फॉर्म पर बैठे हुए
बंदरों में भगदड़ मच गयी। हम लोग समझ गये की अंगारा का आगमन
हो चूका है।"
"अंगारा कौन?"
"डॉ अंगारा हमारे साथ ही आगरा तक जाता था और हमारे समूह
का अभिन्न अंग भी था।
वजन थोढ़ा सा ज्यादा था करीब 110 किग्रा लेकिन
लड़का था बहुत मस्त। उसके दो चक्कर लगा लो तो मोर्निंग वाक
पूरी। लम्बाई कम थी तो वो दूर से ऐसा लगता था जैसे कपडे
पहना कर किसी ने फुटबॉल रख दी हो। खैर लड़का मस्त था।"
"बढ़िया विवरण देते हो।" डॉ बोला।
"अभी तुमने सुने कहाँ है पुरे, बहुत समय है अभी तो, सब सुनाऊंगा ।
आगे सुनो, अंगारा ने आते ही घोषणा की आज 27 है।
 ये उसका रोज का नियम था की वो पुरे जंक्शन
की लड़कियों की गिनती कर के सबको बताता था। तभी ट्रेन
की आने की घोषणा हुयी, ये कोई नयी ट्रेन थी। ट्रेन के आते
ही अंगारा का काम शुरू हो गया। वो तुरंत
चिल्लाया "s5 ,अकेली है" और पूरा झुण्ड s5 को पकड़ने में लग
गया।(क्यूंकि ट्रेन नयी थी कोई स्पेशल वाली सो उस ट्रेन
को कोई जानता भी नहीं था। ऐसी ट्रेन अक्सर
खाली ही चलती हैं।)
ट्रेन चूँकि पूरी खाली थी सो में एक खाली डब्बे में बैठ गया। s5 में
भीढ़ भर गयी थी इसलिए अंगारा मेरे पास ही आकर बैठ गया। ट्रेन
जैसे ही चलने को हुई तभी एक अंकल का आगमन डब्बे में हुआ और
उनके पीछे एक सुन्दर सी बाला का। पता नहीं क्या सोच कर उन
दोनों ने हमारे सामने वाली ही सीट पकड़ ली।
अंगारा की सारी एकाग्रता एक ही जगह लग चुकी थी, अंकल
हमारा मुआयना ऐसे कर रहे थे जैसे हम किसी दुसरे ग्रह के
प्राणी हो। लड़की खिड़की के बाहर देख रही थी। मेरा एकांत
छिन चूका था और में उसे वापस चाहता था। तभी अंगारा मेरे
कान में फुसफुसाया, "भाई कुछ ऐसी बातें कर की ये कन्या मुझसे
इम्प्रेस हो जाये"
मेरी मुश्किल आसान हो गयी थी।
तुरंत ही में बोला। "एक रुपया भी नही दूंगा तुझे। अरे में कहाँ से
लाऊं रोज तेरी दारु के लिए रूपये, कल सौ दिए थे कहाँ गए वो,
दारु पी ली या जुए में हारा या कहीं अपनी छमिया पर
तो नहीं लुटा दिए। बीच में मत बोल, यार मेरे भी खर्चे है। में कब तक
तेरी अय्याशियों का भुगतान करूँगा। न पहले
मेरा पिछला हिसाब कर, करीब 700 रूपये बनते हैं तुझ पर मेरे।"
अब सबकी एकाग्रता अंगारा पर लग चुकी थी। उसने घुर कर मुझे
देखा एक गाली दी और उठकर चला गया। अंगारा के स्वभाव के
आधार पर मेने अनुमान लगा लिया था कि वो s5 में
गया होगा और शाम को मेरे साथ ही लोटेगा।
इधर कन्या ने भी मेरे स्वाभाव का अनुमान (गलत) लगाया और
वो भी उठ कर चली गयी। अब केवल अंकल ही रह गए थ।
चाहता तो में भी उठकर जा सकता था लेकिन मेरा मन बदल
गया था। अब मन मस्ती का हो चूका था डॉ। और उसी दिन
पता लगा कि तीन चीजें कभी भी बदल सकती है डॉ- शेयर
का भाव, किसी संस्था क नियम और आदमी का मन।
समय काटने के लिए अंकल ने सिगरेट सुलगाई और मे किताब
निकाल कर पढने लगा। काफी शांत माहौल था कि तभी अंकल
ने मेरी शांति भंग की।
"नाम क्या है तुम्हारा?"
"जी सुनीत लेकिन प्यार से सब मुझे सुनीत बोलते है।" मैंने जबाब
दिया।
मेरी ही टोन में अंकल ने फिर पूछा "इन दोनों के अलावा भी कोई
नाम है तुम्हारा?"
"जी हाँ, सुनीत।" मेने फिर जवाब दिया।
में शांति से बैठना चाहता था। लेकिन अंकल के सवाल जारी थे
और मेरे जवाब भी।
"पढ़ते हो?"
"जी हाँ और लिख भी लेता हूँ।"
"अच्छा, क्या कर रहे हो?"
"मेरी फोर्थ इयर है।"
"किसकी, इंजिनीयरिंग की या मेडिकल की?"
"अरे नहीं, बारहवीं की।" में अब मज़े लेने के मूढ़ में था।
"क्या मतलब?"
"जी वो तीन साल बेसिक्स क्लियर किये थे ना तो अब
चौथी साल है।"
"अच्छा, आगरा किस कॉलेज में पढ़ते हो?"
"जी पढता तो हाथरस में हूँ।"
"तो आगरा क्यों जा रहे हो?"
"ट्यूशन पढने के लिये।"
"केवल ट्यूशन के लिए आगरा जाते हो, हाथरस में कोई
नहीं पढाता क्या?"
"कई अच्छे टीचर है लेकिन कोई पास नहीं करा पाया। अलीगढ
और मथुरा के टीचर भी नहीं पास करा पाये तो पापा ने
कहा कि आगरा जाओ सो यहाँ आता हूँ पढने।"
अब अंकल पकने लगे थे।
"पापा तो पढ़े लिखे होंगे?"
"जी हाँ, आधी M.A. पास है।"
"आधी M.A. क्या है अब ये?"
"जी M.A. शायद सोलहवी क्लास होती है तो वो आठ पास हैं
मतलब आधी M.A.।"
"आगे जिंदगी का कोई उद्देश्य है या नहीं तुम्हारा?"
"जी दो है।"
"क्या हैं?"
"जी पहला तो बारहवी पास करना और दूसरा किसी ट्रेन के डब्बे
में अकेले बैठना।"
"मुझसे दिक्कत हो रही है मतलब।"
"जी हां हो तो रही है।"
"में उठ रहा हूँ लेकिन तुम्हें एक सलाह देना चाहूँगा। कि जैसी बातें
तुम करते हो उस हिसाब से लेखक बनना, काफी आगे बढोगे।"
इतना कहकर अंकल उठे और चले गये और में उन्हें धन्यवाद् देता रह
गया।
अब मेरा मन थोढ़ा शांत और प्रसन्न हो गया था। और में सुनहरे
भविष्य के सपने देखने लगा लेकिन मुझे पता नहीं था कि ये
प्रसन्नता और शांति कुछ देर की ही है क्योंकि सपने टूटने वाले थे।
खैर किताब मेरे हाथ में थी में पढ़ने में मशगुल हो गया। तभी सामने
से काले कोट वाला निकलाऔर जैसे ही वो डब्बे के तीसरे चैम्बर
में पहुंचा, कोट वाले की आवाज आयी।
"नमस्ते सर"
उसके बाद की बातें मुझे सुनाई नहीं दी। लेकिन जैसे ही काले कोट
वाला मेरे पास आया में समझ गया की क्या बातें हुई होंगी।
"टिकेट दिखाओ?" काले कोट वाले ने कहा।
"नहीं है" मेने जवाब दिया।
"चालान कटा ओगे या जेल जाओगे?"
"नहीं साब MST दिखाऊंगा।"
"MST जनरल डब्बे में लागू होती है स्लीपर क्लास में नही।"
डॉ अब मुझे s5 कोच की याद आ रही थी क्यूंकि जब दैनिक
यात्री एक ग्रुप में होते हैं तो कोई भी टीसी उनसे टिकेट
की पूछने की जुर्रत नहीं कर सकता।
"सर आगरा तक ही जाना है, ट्रेन पूरी खाली थी सो यहाँ बैठ
गया।"
"ए सी कोच में क्यों नहीं बैठे फिर?"
"ही ही ही सर गया तो वहीँ था पर किसी ने
दरवाजा नहीं खोला। सर जाने दो ना, पापा बहुत गरीब हैं
छुड़ा भी नहीं पाएंगे मुझे।"
"अच्छा, क्या करते हैं तुम्हारे पिताजी?"
"जी, बर्तन बेचते हैं।"
"फिर कहाँ से गरीब हो गए? अच्छी खासी दुकान होगी।"
"नहीं सर, वो क्या है की आजकल घर के बेच रहे है।"
तभी अंकल का आगमन हुआ मेरे केबिन में।
"जो मेने कहा था सही निकला की नहीं शर्माजी?" अंकल ने
कहा।
"सौ टांक सही निकला सर।" काले कोट वाले ने जवाब दिया।
"अच्छा तो में चलता हूँ सर फिर मिलूँगा, राजा मंडी स्टेशन आ
गया है।" इतना कहकर काला कोट चला गया।
"अंकल, में समझ गया था की ये आपकी ही फ़रमाईश पर मेरे पास
आये थे।"
"अच्छा, पर कैसे?"
"वो छोड़ो, खैर आपसे मिलकर आज मन प्रसन्न हुआ।"
"मेरा भी, मुझे अपना फ़ोन नंबर दो कभी कभार बात कर
लिया करेंगे।"
मेने अंकल को अपना नंबर दिया और उनसे
विदा ली क्यूंकि गाडी स्टेशन पर रुक चुकी थी। गेट से बाहर
निकलते ही मेने एक ऑटो वाले को आवाज दी। वो आया तो मेने
उससे पूछा "संजय प्लेस जाओगे क्या?"
"हां जाऊँगा।" उसने जबाव दिया।
मै बोला, "तो जा फिर खड़ा क्यों है।"
वो मुझे बुरा भला कहकर चला गया। में भी पैदल अपने सफ़र पर
निकल लिया रोज की तरह। स्टेशन से इंस्टिट्यूट तक पहुँचने में 45
मिनट लगते थे लेकिन ऑटो में 35 मिनट बच जाते थे और
बिना ऑटो के मेरे पांच रूपये भी बच जाते थे। अब दिमाग में सपने
आने शुरू हो गए थे। आज के टेस्ट के बाद अगले हफ्ते से हमारी ओन
जॉब ट्रेनिंग शुरू होने वाली थी। दो महीने की ट्रेनिंग
का हमको आठ हज़ार रुपया मिलना था। उसके बाद डायरेक्ट
जॉब सात हज़ार तनख्वाह। मेने प्लान
बनाया था की पहली तनख्वाह मिलते ही में
नया नोकिया 3315 खरीदूंगा और एस्कोटेल की सिम, हमारे बेच
मैट्स के प्लान कुछ अलग थे, कोई
वैश्नोदेबी जाना चाहता था कोई स्वर्णमंदिर कोई
पापा को साइकिल गिफ्ट करना चाहता था कोई
मम्मी को कुंडल। लेकिन डॉ जिन्दगी में जैसा हम सोचते है
वैसा शायद कभी कभार ही होता है। सपने देखते हुए में इंस्टिट्यूट
पहुँचा तो देखा की सारे साथी ऊपर ही थे और उनका मुहं
ऐसा हो रहा था की एटम बम अटैक के बाद
नागासाकी का हाल था।
"सब बर्बाद हो गया" एक ने कहा।
"सब ख़तम।" दुसरे ने कहा।
"सारे सपने टूट गए।" तीसरी ने कहा।
"हुआ क्या ?" मेने पूछा।
किसी ने कुछ बताया नहीं या कोई कुछ बता नहीं पाया मुझे
पता नहीं था। लेकिन में जानना चाहता था इसलिए में बेसमेंट में
उतरा। और जो सामने था उसे देखकर बस हार्ट अटैक ही नहीं हुआ
डॉ बाकी सब हो गया था।
इंस्टिट्यूट के दरवाजे पर एक पोस्टर लगा हुआ था जिस पर
लिखा था "कंपनी दिवालिया होने की घोषणा कर चुकी है
अतः इंस्टिट्यूट और प्रोडक्शन हाउस आज से हमेशा के लिए बंद है।"
डॉ, दुखी मन से मै ऊपर आया। ऊपर सारे साथियों से बात हुई
कि अब हो क्या सकता है? कंपनी पर हम कोई केस भी नही कर
सकते थे क्यूंकि वो दिवालिया थी। अब दो ही रास्ते थे
या तो गुडगाँव जाकर 30000 रूपये देकर तीन महीने की ओन जॉब
ट्रेनिंग करो या कोई दूसरा करियर चुनो।
क्यूंकि पापा की फैक्ट्री पर एक साल से प्रदुषण बोर्ड वालों ने
ताला लटका रखा था इसलिए मुझे मालुम था कि मुझे
क्या चुनना था।"
"डॉ, जिंदगी में उस दिन मुझे दर्द का सही अर्थ पता चला था।
सपने टूटने का दर्द हड्डी टूटने के दर्द से ज्यादा होता है और हम
सबको इसी दर्द का एहसास हो रहा था। दुखी मन से हम सबने एक
दुसरे से विदा ली और भविष्य में मिलने का वायदा भी किया।
उस दिन हम सब बिछड़ने के लिए तैयार हो चुके थे।"
"एक बात बताओ।"
"पूछो, डॉ।"
"तुम्हारे बैच के साथियों में से किसी ने ओन जॉब ट्रेनिंग
की थी या नहीं?"
"तीन साथियों ने की थी, डॉ, जिनमें से एक आधी छोड कर
चला आया, दुसरे ने बंगलोर में अपना प्रोडक्शन हाउस खोल
रखा है और तीसरा अमेरिका में क्वालिटी एनालिस्ट बन
गया है।"
"अगर तुम करते तो तुम कहाँ होते?"
"ये तो पता नहीं कहाँ होता लेकिन ये पता है कहाँ नहीं होता।"
"कहाँ नहीं होते?"
"यहाँ तुम्हारे पास नहीं होता डॉ मै।"
"सही कह रहे हो। वैसे दुःख तो होता होगा तुम्हें आज कि अगर तुम
भी ट्रेनिंग पर चले जाते तो आज इस जंगल में मेरे साथ नहीं होते। है
ना?"
"डॉ, हमें जिन्दगी में बहुत कुछ मिलता है लेकिन सब कुछ
नहीं मिलता, बहुत कुछ हमसे छिन जाता है पर सब कुछ
नहीं छिनता । हम कुछ पाते हैं हम कुछ खोते हैं लेकिन
जिंदगी बदस्तूर जारी रहती है। और रही बात दर्द की तो दर्द
तो जिन्दगी में सहना ही पड़ता है। उस दर्द को पीछे छोड़कर में
अब इस रास्ते पर निकल आया हूँ।
"यानी अपनी ये जिन्दगी तुमने खुद चुन ली?"
"डॉ, हम जिन्दगी को नही चुनते ये जिंदगी हमको चुनती है। जैसे
तुमको चुना है ऐसे ही मुझको चुना है और सबको चुनती है।"
"कहाँ से सीखी है ये बातें तुमने?"
"डॉ, हम सब इसी जिन्दगी से सीखते है, जिंदगी सबसे
बड़ी शिक्षिका है।
"तो अब जिन्दगी में इसी रास्ते पर आगे बढ़ने का इरादा है
या रास्ता बदलोगे?
"डॉ, में अपने राज अपने आप को भी नहीं बताता तुमको कैसे
बता सकता हूँ लेकिन हर सीधे रास्ते पर कभी न कभी चौराहा आ
ही जाता है।"
"घुमाते बहुत हो।"
"वो तो मेरी आदत है खैर डॉ आगे की कहानी कुछ देर बाद शुरू करते
है। आओ जंगल की सैर पर चलते है।"

1 comment:

  1. कहानी थोड़ी लम्बी हो गयी है इसलिए क्षमा चाहता हूँ।
    अगर भाषा सम्बन्धी या कोई गलती नजर आये तो नौसखिया समझ कर माफ़ कर देना।
    आगे की घटना जल्दी ही लिखूंगा।

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