सत्य घटना पर आधारित।
पिछले साल के किसी एक गर्मी के दिन का एक वाकया है। (कहानी लंबी है आपके हिसाब से। अगर समय हो तो ही पढ़ें।)
हम इंटरवल पर विद्यालय की सबसे खतरनाक गैलरी में अपने नियमित राउंड पर थे। ये गैलरी हमारे विद्यालय की सबसे व्यस्त गैलरी है। 15 मिनट के लंच ब्रेक में इस गैलरी से करीब दो हज़ार के लगभग छात्र आवागमन करते हैं। खैर लन्च ब्रेक था तो समस्त स्टूडेंट्स 15 मिनट की आजादी का जश्न मना रहे थे। अब विद्यालय प्रशाशन ने उनकी आज़ादी में खलल डालने के लिए उस गैलरी में हमको नियुक्त किया था। स्टूडेंट्स अपना हो हल्ला कर रहे थे और हम अपना हो हल्ला, (मतलब उनको डाँट रहे थे।) तभी अचानक किसी बात पर हमने 12th की एक लड़की को वहीँ गैलरी में सबके सामने तगड़ी सी डाँट पिला दी और उसने पी भी ली। खैर इंटरवल समाप्त हुआ। हम जा रहे थे और वो कन्या हमारे सामने आ रही थी। सामने आते ही उसने औचक सवाल किया, "सर! आप इतना तेज क्यों डांटते हो? इससे अच्छा पीट ही लिया करो।"
हमको जाने की जल्दी थी क्योंकि 5th पीरियड पर हम लन्च करते हैं। इसलिए हमने उस कन्या को कहा "लंबी कहानी है, फिर कभी आपकी क्लास में आकर बताते हैं।"
पूरा पुराना साल बीत गया लेकिन उस बालिका को हम अपना जवाब नहीं दे पाये। एक बार गए भी थे वक़्त निकाल कर 12th में लेकिन उस दिन वो कन्या कक्षा में अनुपस्थित थी।
खैर बिटिया उस दिन का जवाब तेरे लिए यहाँ लिख रहा हूँ। ये जवाब या कहानी तुम तक पहुँच ही जायेगी ऐसा हमको पूर्ण विश्वास है।
बात उस समय की है जब धरती पर इंसान और सर्प एकसाथ रहते थे। इंसान प्रकृति विरोधी था और सर्प प्रकृतिप्रेमी थे। अब जब भी इंसान कोई गलत कार्य करता, सर्प इंसान को तुरंत डस लेते। इंसान तुरंत मर जाता। अब इंसान परेशान रहने लगा। इंसानी बड़े बूढ़े परेशान होने लगे क्योंकि उनकी आजादी में इन तथाकथित सर्पों की वजह से खलल पड़ रही थी। तब कुछेक शक्तिशाली इंसानों ने शिवजी (क्योंकि सर्प शिवजी का अंगरक्षक माना जाता था) की प्रार्थना की। अब शिवजी का दूसरा नाम भोले है क्योंकि वो भोले हैं। उन्होंने इंसानों की व्यधा सुनकर तुरंत सारे सर्पों को एक नोटिस भेज दिया, "अगर आज के बाद किसी भी सर्प ने किसी भी इंसान को डसा तो उस सर्प को किसी और प्रजाति में बदलना होगा।"
सारे सर्प डर गए और इस नोटिस के डर से इंसानों को डसना उन्होंने शिवजी के तत्काल प्रभाव से तुरंत छोड़ दिया।
अब ये हुआ कि इंसानों ने सर्प के महत्त्व को ही दरकिनार कर दिया। अब तो जहाँ सर्प दिखाई दिया, वहां उस पर ईंट पड़े। सर्प पर सर्प बाँध कर रस्सी बनायीं जाती और उस पर इंसान अपने कपड़े सुखाते। किसी को भूसे की बोरी बांधनी होती और कोई रस्सी न मिलती तो क्या सर्प है न। सर्प से भूसे की बोरी बाँध ली।
कुल मिलाकर शिवजी के एक आदेश से अब सर्प अपने अस्तित्व को तलाश रहे थे।
लेकिन अब बारी कुछ ज्ञानी सर्पों की थी। उन्होंने शिवजी की तपस्या करके उनको प्रसन्न किया और अपनी समस्त समस्या बताई। कहा कि "अब हमारा तो कोई औचित्य नहीं हैं। हम डस ही नहीं सकते तो कैसे संतुलन बनाएं?"
तब शिवजी ने कहा, "मूर्खों तुमसे डसने को ही तो मना किया था, फुंफकारने की मना थोड़े ही की थी।"
तो बस यही हम कर रहे हैं और करते रहेंगे। हमारा काम और ड्यूटी इंसानों को सुधारना और संतुलन बनाना है। हम डस नहीं सकते तो क्या फुंफकारना भी बंद कर दें?
न जी, हम ये ही नहीं कर सकते। खैर जिनको हमारे डाँटने से दिक्कत होती है उन्होंने शायद हमारा प्यार नहीं देखा। हमारा प्यार देखना है तो एक दिन हमारी किसी क्लास में आइयेगा।
सर्प हम हैं, इंसान आप हो और शिवजी CBSE है।
ये इतनी लंबी पोस्ट उस कन्या को समर्पित जिसका मुझे नाम भी नहीं मालूम लेकिन पिछली साल 12 D में थी
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