Wednesday, 18 May 2016

कहानी कहने की कला आजकल लुप्त सी होती जा रही है और जिस हिसाब से युवा पीढ़ी चैट कर रही है तो शायद भविष्य में कुछ लोगों की चैट हिस्ट्री भी नयी कहानियों का मरकज बनेगी। खैर लुप्त होती कला का एक नमूना पेशेखिदमत हैं। पढोगे तभी तो आगे बढ़ोगे।
तो जनाब किसी मज़ार पर एक फकीर रहा करते थे। सैकड़ों भक्त उस मज़ार पर आकर दान-दक्षिणा चढ़ाते और मन्नत माँगा करते थे। उन भक्तों में एक फेरीवाला भी था। वह बहुत गरीब था, फिर भी नियमानुसार मज़ार पर आकर माथा टेकता, फकीर की सेवा करता, और फिर अपने काम पर चला जाता। उसका कपड़े का व्यवसाय था, कपड़ों की भारी पोटली कंधों पर लिए सुबह से लेकर शाम तक गाँवों की गलियों में फेरी लगाता और कपड़े बेचता।
आखिरकार एक दिन उस फकीर को उस फेरीवाले पर दया आ गई और फ़क़ीर ने अपना गधा फेरीवाले को भेंट कर दिया।
अब तो फेरीवाले की आधी समस्याएं हल हो गईं। अब वह सारे कपड़े गधे पर लादता, जगह-जगह जाता और जब थक जाता तो खुद भी गधे पर बैठ जाता। फेरीवाले की जिंदगी अब कुछ सुखद हो चली थी। यूं ही कुछ महीने बीत गए। लेकिन समय की एक आदत होती है चाहे वो अच्छा हो या बुरा, जल्दी ही बीत जाता है। तो फेरीवाले का भी सही समय बीत चला था और एक दिन गधे की मृत्यु हो गई।
फेरीवाला बहुत दुखी हुआ, पर मृत्यु के आगे किसकी पेश चली है तो फेरीवाले ने गधे को उचित स्थान पर दफनाया, उसकी कब्र बनाई और फूट-फूट कर रोने लगा। उसका रोना लाज़िमी था, आखिर गधे ने उसकी जिंदगी की कुछ कठिनाइयों को ख़त्म ही किया था।
उधर, समीप से जा रहे किसी व्यक्ति ने
जब यह दृश्य देखा, तो सोचा जरूर किसी संत की मज़ार होगी। तभी यह फेरीवाला यहां बैठकर अपना दुख रो रहा है। यह सोचकर उस व्यक्ति ने गधे की कब्र पर अपना माथा टेका और अपनी मन्नत हेतु वहां प्रार्थना की और कुछ पैसे चढ़ाकर वहां से चला गया।
खुदा न खास्ता कुछ दिनों के उपरांत ही उस व्यक्ति की मनोकामना उसके कर्मयोग की वजह से पूर्ण हो गई। लेकिन अन्धविश्वास के मारे उस व्यक्ति ने खुशी की वजह से सारे गांव में डंका बजवा दिया कि अमुक स्थान पर एक फकीर की मज़ार है। वहां जाकर जो अरदास करो वह पूर्ण होती है। मनचाही मुरादें वहां बख्शी जाती हैं।
उस दिन से उस कब्र पर भक्तों का जो तांता लगना शुरू हो हुआ तो बस हो ही गया। दूर-दराज से भक्त अपनी मुरादें लेकर वहाँ आने लगे और तमाम तरीके के चढ़ावे और रूपये चढाने लगे। अब जनाब, फेरीवाले की तो चांदी हो गई, बैठे-बैठे उसे कमाई का साधन मिल गया था।
फेरीवाले के दिन अब और ज्यादा सही गुजर रहे थे। अब वो फेरीवाला न होकर पीर बन चुका था। लेकिन दुनिया तो गोल होती है।
एक दिन वही फकीर, जिन्होंने फेरीवाले को अपना गधा भेंट स्वरूप दिया था, वहां माथा टेकने आये और तमाम चढ़ावा दिया। जाते समय फेरीवाले की नजर उन पर पड़ी तो उनको देखते ही फेरीवाले ने उनके चरण पकड़ लिए और बोला-
"मियाँ, आपके गधे ने तो मेरी जिंदगी बना दी। जब तक जीवित था तब तक मेरे रोजगार में मेरी मदद करता था और मरने के बाद मेरी जीविका का साधन बन गया है।"
फ़क़ीर ने ज़बाब दिया, "सही है बच्चा। अल्लाहताला तुमको बरकत दे।"
फेरीवाले ने कहा, "मुझ पर उन पीर पैगम्बर की कृपा हुयी जिनकी सेवा आप और मैं उनकी मज़ार पर करते थे। मेरे नित सेवाभाव और दान से उनकी कृपादृष्टि मुझ पर पड़ी और मुझ पर से सारे संकट हट गए हैं।"
तब फ़क़ीर ने हँसते हुए कहा, "बेटा तू मूरख है , नितांत और महा मूरख है। मैं तो भागा हुआ अपराधी था, बूढा हो गया था तो बस फकीर बन गया। बादबाकी जिस मजार पर आकर तुम नमाज़ पढ़कर दुआ माँगते थे वो मजार इस गधे की माँ की है। वहां इस गधे की माँ दफ़न है। चढ़ावे में आने वाले रुपयों से हम मौज की जिंदगी जी रहे हैं। "
फेरीवाला सुन कर हंस-हंस कर लोटपोट हो गया था।मियाँ शायद इसे पढ़कर आप लोटपोट न हो पाओगे।
खैर अब आप गधों और उनकी माँ की मजारों पर तो न जाओगे ऐसा हम सोचते है। बादबाकी "उद्यमेन हि सिद्धयन्ति कार्याणि न हि मनोरथै" तो आपने भी सातवीं कक्षा में पढ़ रखा होगा।और अगर मनोकामना लेकर जाना भी है तो पहाड़ों पर जाओ, सारी देवियाँ वहीँ है। लेकिन हमारी जानकारी के अनुसार कोई मज़ार आपको पहाड़ों पर न मिलेगी।
हमारे देवता और देवी भी मेहनती थे जो उस ज़माने में पहाड़ो पर पैदल चले जाते थे।

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