Thursday, 29 February 2024

#Exam


एग्जाम और इंटरव्यू जैसी चीज़ों की टेंशन हर बन्दे को होती है, हमको भी होती है और तुमको भी हो रही होगी। क्या कहा, "नहीं हो रही।" ठीक है, ठीक है, मान लिया कि आप बच्चे नहीं है, बड़े हो गए हैं। लेकिन हम जानते हैं कि हो रही है। दरअसल जहाँ पहले ही पता हो कि कोई जज करने ही बैठा है वहां टेंशन होना स्वाभाविक ही है। ये बोर्ड के एग्जाम्स में जो जज किये जाने की टेंशन है ना वो सिर्फ पहली बार है, इसलिए अजीब लग रही है। जिन्दगी में कई बार ऐसी ही टेंशन फिर से होगी।

 10th में होगी, 12th में होगी, फिर competitive exams में होगी, कॉलेज में एडमिशन लेने के वक्त होगी, नौकरी पाने के लिए इंटरव्यू के वक़्त होगी और एक दिन फिर जब शादी के लिए अपना पार्टनर चुन रहे होंगे ना तो जिस लड़की या लड़के से मिलने जा रहे होंगे, वहां सेलेक्ट होंगे या रिजेक्ट ये सोच सोच के उस दिन भी होगी।


अब जिंदगी में भाग जाने का कोई स्कोप तो होता नहीं है। आज नहीं तो कल वो डरावनी सी चीज़ दोबारा सामने आएगी। जिस चीज़ से भागेंगे वो तो बार बार हर मोड़ पर सामने आएगी ही। 


ऐसी चीजों में से सबसे आसान एग्जामस  के डर से निपटना होता है। बहुत सिंपल है, जो ढेर सी सलाह, कभी डायरेक्ट कभी इनडायरेक्ट आपको दी गयीं थी, उन्हें याद करना पड़ता है बस।


छः पॉइंट बता रहा हूँ, ताकि आंसरशीट में आप कुछ ढंग का लिख सको।


1. एग्जाम होते ही हैं ये आपको बचपन से ही पता है। तो जैसे हर बार टाइम टेबल होता है, वैसा ही टाइम टेबल अपने लिए भी रखिये। फिक्स्ड टाइम टेबल के बिना अचिवेमेंट नहीं मिलती। जैसे किसी के ट्यूशन के समय फिक्स टाइम पर वहां खड़े रहते हो, कितने बजे कोई किस गली से गुज़रता है वो जानकर आप भी अपना सारा काम छोड़कर वहीं रोज खड़े होते हो। यही होता है टाइमटेबल।

शुरुआत में कुछ दिन रूटीन फॉलो करने में दिक्कत होती है, थोड़े दिन में प्रैक्टिस हो जाएगी। ज्यादा से ज्यादा हफ्ता भर। तो एक टाइम टेबल बनाओ पढ़ने के लिए और उस पर कायम रहो।


2. रिवाइज़, रिवाइज़, रिवाइज़! ये दोहराने को तीन बार रिवाइज़ क्यों लिखा है हमने? क्योंकि आप जो पढ़ते हैं उसे अगर रिवाइज़ नहीं करेंगे तो अगले दिन उसका 18% ही याद रहेगा। एक बार रिवाइज़ करेंगे तो करीब 50% याद होगा। दोबारा रिवाइज़ करने पर करीब 72% से 80% के बीच। तीसरे रिविज़न में वो 95% से ऊपर याद रहता है। अपने खुद के अनुभव से ये आपको पहले ही पता है, ऐसा होता है। आप बस ध्यान देना भूल गए थे। हाँ, कितने परसेंट याद रहेगा वो साइंटिफिक रिकार्ड्स होते हैं वो हम आपसे ज्यादा जानते हैं, क्योंकि हम आपसे बड़े हैं।


3. लिख के प्रैक्टिस करना सीखने का, याद करने का बेहतर तरीका होता है। अब आप पूछेंगे क्यों? तो प्यारो, एक तो लिखने के लिए तीन बार पढ़ना पड़ता है तो रिविजन अपने आप हो जाता है। दूसरा कि आपको एग्जाम लिख के देना होगा मतलब तीन घंटे के पेपर में ही सारा कुछ लिखना है। अगर आपकी लिखने की अच्छी खासी प्रैक्टिस नहीं है तो एग्जाम में क्वेश्चन छूट जायेंगे। नोट्स अपने खुद के बनाये हुए हों तो समझ में भी आसानी से आते हैं। ये भी पहले से पता है आपको, दोबारा याद दिला दिया है बस।


5. जब और पढ़ने का मन ना करे तो थोड़ी देर के लिए (दुबारा बोलते हैं, केवल थोड़ी देर के लिए।) एन्टरटेनमेंट में कोई बहुत हर्ज़ नहीं है। लेकिन इन्टरटेनमेंट का मतलब टीवी, इंस्टाग्राम, फेसबुक, और यूट्यूब नहीं होता है। घर से बाहर निकलिए, खुली हवा में जाईये, दोस्तों से मिलिए केवल। टीवी और इंटरनेट आपके पास हमेशा होगा लेकिन दोस्त नहीं। स्कूल ख़त्म होते ही सारे दोस्त अलग अलग जगहों पे होंगे, उनसे मिल नहीं पाएंगे आप हर रोज़ की तरह। मनोरंजन के लिए इंटरनेट / टीवी से बेटर आप्शन है दोस्तों से मिलना।


6. पूरी पूरी रात जाग के और दिन में सो के किसी को टॉपर बनते देखा है क्या? आपके क्लास के टॉपर पूरी पूरी रात जबरदस्ती जाग के पढाई करते हैं क्या? नींद जरुरी होती है प्यारो, अगर पता न हो तो हमसे पूछो। लगातार जागने और बेवक्त सोने से आपका रूटीन भी बिगड़ेगा और सेहत भी। दिमाग जो ख़राब होगा वो अलग। तो 24 घंटों में कम से कम 6 घंटे तो भरपूर सोइयेगा, 7 घंटे तो बहुत खूब, बस इससे ज्यादा नहीं।


और अगर ऊपर लिखा हुआ इतना पढ़कर भी आपको ये नहीं पता चला कि चौथा पॉइंट मैंने लिखा ही नहीं है तो कसम इंस्टाग्राम रील्स की, आप ध्यान से पढ़ना भूल गए है। इसे चौथा पॉइंट समझें। जो भी पढ़ें ध्यान से पढ़ें, फेसबुक की पोस्ट समझ कर न पढ़ें। ध्यान रखें इस एक महीने की पढाई का परिणाम आपके भविष्य को निर्धारित करेगा।


और आखिर में बता दें कि डर सभी को लगता है। पापा–मम्मी, अंकल-आंटी सबके सब अपने नए स्मार्ट फ़ोन की सेटिंग आपको करने के लिए क्यों थमा देते हैं? क्योंकि उनको खुद करने में डर लगता है, कुछ बिगड़ ना जाये, इसलिए आपको थमाते हैं ना? तो एग्जाम्स का डर लग भी रहा हो तो कोई बहुत ज्यादा फ़िक्र करने की बात नहीं। जो पच्चीस-पच्चीस साल के घोड़े हो गए ना उन्हें भी इंटरव्यू फेस करने में डर लगता है। हम लोगों को भी लगता है। डर तुमको पहली बार चाय बनाने में भी लगा होगा, डर सबको लगता है। तुमको भी लगता है, मुझको भी लगता है, और तुम्हारे पेरेंट्स को भी लगता है कि कहीं तुम्हारे ग्रेड्स कम न रह जाएँ।


बादबाकी, गब्बर सिंह कहे थे कि, "जो डर गया सो मर गया।" तो कुछ सोच के ही कहे थे वो।


सारी परीक्षाओं में आपका नसीब बुलंद हो। मेरा शुभाशीष आपके साथ रहेगा।



Wednesday, 22 January 2020

#कलाकार 2

एक कलाकार था जो कि नकली नोट छापने का धंधा करता था। वो अपने काम में इतना माहिर था कि उसे खुद पर इतना विश्वास था कि वो कोई भी नोट छाप दे वो चलेगा ही चलेगा।


इसी विश्वास के तहत उसने पंद्रह रूपये का नोट छापा। नोट तो छप गया लेकिन समस्या उस नोट को चलाने की थी क्योंकि शहर का हर वाशिंदा समझ जाता कि नोट नकली है इसलिये उसने बहुत लंबा सफर किया और एक गाँव में पहुँचा। गाँव में घुसते ही उसने देखा कि एक कुम्हार कुल्हड़ बना रहा है।

कलाकार को अपना शिकार दिखाई दे गया। वो तुरंत उसके पास पहुँचा और उसे अपना पंद्रह रूपये का नोट पकड़ाकर बोला, "भाई, इसका छुट्टा कर दो।"

कुम्हार ने पहले तो उसे देखा, फिर नोट को देखा, और फिर उसे दुबारा घूरकर देखा।

कलाकार की हवा ख़राब हो गयी। उसे तुरंत ही महसूस हो गया कि वो बस पकड़ा जाने वाला है, लेकिन उसकी कलाकारी ने रंग दिखाया और कुम्हार बोला,

"बाबूजी, इतने रुपये तो मेरे पास नहीं होंगे। गल्ले में चौदह रूपये पड़े हैं। अगर एक रूपये का घाटा सहन कर सको तो छुट्टे हो सकते हैं।"

कलाकार को एक रूपये में कौनसी आफत आ रही थी इसलिये उसने तुरंत हाँ कह दिया।

कुम्हार ने पंद्रह रूपये का नोट अपने गल्ले में रखा और उस कलाकार को  तुरंत सात-सात के दो नोट पकड़ाकर उसके पंद्रह रुपये का छुट्टा कर दिया।

उस दिन कलाकार की समझ में आ गया था कि दुनिया में उससे भी बड़े कलाकार मौजूद हैं।

(एक पुरानी कथा मेरे शब्दों में)

#एक_सलाह_फिर

#मेरा_अनुभव

#जन्मदिवस06


लो, जैसा कि मैंने पहले भी कहा था कि समय पँख लगाकर उड़ता चला जा रहा है। देखते-देखते आज एक वर्ष और बीत गया और तुम छः वर्ष के हो गए इसलिए तुमको एक तोहफा देना लाज़िमी था जो कि भौतिक वस्तु के स्वरूप में तुम पा चुके लेकिन अभौतिक तोहफा अभी बाकी है भले ही ये अभी तुम्हारे किसी काम का नहीं होगा लेकिन एक वक्त आएगा जब तुमको इस तोहफे की सार्थकता का एहसास होगा।

जिस दिन तुम इसे पढ़ो उस दिन बस एक कल्पना करना कि तुम्हारे सामने एक कुत्ता बैठा है और तुम उसको हड्डियों के टुकड़े फैंक रहे हो। अब अपनी कल्पना में ही उस कुत्ते की हरकतों के बारे में सोचना। वो कुत्ता तुम्हारे द्वारा फैंके गए हर टुकड़े पर अपनी प्रतिक्रिया  जरूर दर्शायेगा, उस टुकड़े के पीछे जरूर भागेगा क्योंकि उसे ये मजेदार और आसान लगता है। ये मैं आज बता रहा हूँ परन्तु चरितार्थ ये उस दिन भी रहेगा जब तुम इसे पढ़ रहे होगे।

अब अपनी कल्पनाओं में कुत्ते को शेर से बदल देना और सोचना कि तुम एक शेर के सामने हड्डियों के टुकड़े फैंक रहे हो। शेर तुम्हारे द्वारा फैंकी गई एक भी हड्डी के पीछे नहीं भागेगा और न ही कोई प्रतिक्रिया देगा। जानते हो क्यों?

क्योंकि उस शेर की रुचि तुम्हारे द्वारा फैंकी गई एक, दो, तीन या कुछ हड्डियों में नहीं होगी बल्कि हड्डियों और मांस से लबरेज तुम में होगी। भले ही शेर का शिकार पकड़ने का प्रतिशत 40% हो, भले ही शिकार पकड़ना उसके लिए कितना भी दुष्कर हो लेकिन वो बड़े शिकार की ही ओर भागेगा न कि हड्डियों के टुकड़े और छोटे शिकार के पीछे। तुम शेर को कभी खरगोश या किसी पक्षी का शिकार करते हुए नहीं देखोगे।

शेर कभी हड्डी के टुकड़ों के पीछे नहीं भागता क्योंकि उसका लक्ष्य हड्डियों से भरा हुआ एक शरीर होता है। जबकि कुत्ता केवल हड्डियों के टुकड़ों के पीछे भागता है क्योंकि उसे आसान और मजेदार चीजें चाहिए।

अब आती है बात मुद्दे की....  जब तुम बड़े हो रहे होगे तो तमाम व्यवधान, गलत काम, गलत लोग, इन हड्डियों के टुकड़ों के रूप में तुम्हारे समक्ष आएंगे और जैसा कि मैं ऊपर बता चुका हूँ कि इन टुकड़ों के पीछे भागना तुमको आसान और मजेदार लग सकता है।

जिंदगी तुम्हारी है इसलिए इस समय तुमको सोचना है कि हड्डियाँ बीननी हैं या शेर बनना है (मतलब छोटे लक्ष्य चुनने हैं या बड़े?)

खैर, जिस समय तुम इस पोस्ट को पढ़ रहे होगे, उस समय तुम इतने समझदार बन चुके होगे कि इस लेख के वास्तविक मंतव्य को समझ कर अपने भविष्य को ढंग से संजो सको।

बादबाक़ी, जन्मदिवस की हार्दिक शुभकामनाएं प्यारे रुद्राय। सदा स्वस्थ रहो और उन्नति पथ पर अग्रसरित रहो।

Monday, 6 January 2020

Project 2 - Computer Application (165)

All the students of Class X are suggested to submit a project file latest by 15th January, 2020. The tasks for the project file are as follow-

Task-1: Create an INTERNAL CSS Webpage Displaying Your Name three times in separate lines. In first  line you must use three character formatting attributes, in second line you must use three font formatting attributes and in third line you must use three Border Attributes. Take the screenshots of both coding and webpage, print them out to submit.

Task-2: Write a Python Program to Calculate Simple Interest. (Data must be entered by user)

Task-3: Write a Python Program to check whether the given number is even or odd.

Task-4: Write a Python Program to find out greatest Number Among Three numbers entered by user.

Task- 4: Write a Python Program to Print First Ten Natural Numbers in Reverse Order.

Task-5: Write a Python Program to Print the Table of given Number.

Note:

1. Task-2 to Task-5 must be submitted along with their actual Output.

2. Python Programs can be Submitted either in Hand-Written Sheets (By Coloured Ink) or in Prints Of Their Screenshots.

3. A Coverpage must be there with each file having information such as Student Name, Class, Section, Roll No.School name, Session, Submitted to etc.

4. At The Time Of Submission All the sheets must be covered in a file.

In Hope of your Bright Future.

Regards:

Sunit Sharma.

Saturday, 2 June 2018


#मैंट्रेनअजनबीऔरमृतात्मा।
(पहला पार्ट)
साल 2001...
यह जनवरी महीने के रविवार की एक साधारण सी रात थी। वैसे तो भारत में कुछ महीने कुछ खास जगहों पर कुछ खास वजह से पहचाने जाते हैं। जैसे जनवरी महीना उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और दिल्ली जैसे मैदानी इलाकों में अपनी  हांड-कंपाऊ सर्दी की वजह से जाना जाता है। ऐसी ही कड़कड़ाती सर्दी की एक रात, ठीक 11 बजे एक एक्सप्रेस ट्रेन आगरा कैंट रेलवे स्टेशन पर आकर रुकी। ग्वालियर से आगरा तक आते-आते इस ट्रेन को ढाई घंटे लग गये थे। स्टेशन पर प्राणीमात्र के नाम पर केवल एक लड़का जिसकी उम्र 21 या 22 साल की लग रही थी, ऊपर से नीचे तक ऊनी कपड़ों में लिपटा हुआ खड़ा हुया था। कपड़ो से इतनी बुरी तरह लिपटे होने के बावजूद उसका जिस्म सर्द हवा के झोंके से काँप उठता था। ट्रेन के रुकते ही लड़का फुर्ती से ट्रेन के एक स्लीपर क्लास कूपे में सवार हो गया। सर्दी का मौसम, रात का सफर, ट्रेन में मुसाफिर बहुत कम थे। मुसाफिरों की यह संख्या शायद सर्दी की वजह से या उस लड़के की किस्मत की वजह से कम थी। कूपे में नीले रंग का मद्धम प्रकाश फैला हुआ था और तमाम खिड़कियां बंद थी लेकिन सर्द हवा न जाने कहाँ से अंदर आकर मुसाफिरों के कंबलों और ऊनी कपड़ों से लिपटे हुए बदन के साथ गुदगुदी कर रही थी। लड़का कूपे में दाखिल होते ही अपने  बैठने के लिए माकूल जगह की तलाश करने लगा।
कहने को तो पूरी ट्रेन में मुसाफिर कम थे लेकिन फिर भी इक्का- दुक्का कोई न कोई जना कूपे के हर केबिन में सवार अपनी सीट पर पसरा हुआ था सिवाय एक केबिन के। इस केबिन में केवल एक लड़का बैठा हुआ था, जिसके तन पर इतनी सर्दी में भी जीन्स-शर्ट के अलावा केवल एक जैकेट थी और सर पर न कोई कैप और न ही मफलर था। लड़के के अतिरिक्त और कोई मुसाफिर इस केबिन में नहीं था और शायद यही लड़का बाकी मुसाफिरों की तरह सोया हुआ नहीं था। लड़का भाव-शून्य बैठा हुआ एक किताब पढ़ रहा था जिसका शीर्षक "मुक्ति की ओर" उसकी उम्र के हिसाब से मेल नहीं खा रहा था। अपने आस-पास के माहौल से पूरी तरह निर्लिप्त वो लड़का इतनी कम रोशनी में भी अपनी किताब में खोया हुआ था या तो किताब बहुत ज्यादा रोचक थी या उसकी आँखे निशाचरी थीं जो केवल मद्धम रोशनी में ही सही ढंग से देख पातीं थीं।
दुर्भाग्यवश उस लड़के ने बैठने के लिए उसी केबिन को चुना और उस जैकेट वाले लड़के के सामने आकर बैठ गया। शायद वो एक हमउम्र होने का एहसास रहा हो या खाली सीट का मिलना बहरहाल अब उस केबिन में दो मुसाफिर सवार थे और दोनों उस एक्सप्रेस ट्रेन की मार्फ़त अपनी मंजिल की ओर अग्रसर थे। जैकेट वाले ने नए लड़के की तरफ एक नजर भी नहीं डाली थी और उसे पूरी तरह अवहेलित कर दिया था। इससे नया लड़का खुद को असहज महसूस कर रहा था। जैकेट वाले का व्यक्तित्व कुछ रहस्यमयी सा था। नया लड़का उसे अचरज से देखता हुआ सोच रहा था क़ि इतनी कम रोशनी में भी भला कोई इंसान पढ़ कैसे सकता है? ट्रेन आगरा कैंट से रवाना होकर अब दिल्ली की ओर जा रही थी। ट्रेन की गति बढ़ने के साथ ही ट्रेन में बंद खिड़कियों से आती सर्द हवा भी अब थोड़ी तेज हो चली थी। नए लड़के ने अपने शॉल को अपने कानों पर लपेट लिया लेकिन जैकेट वाले पर हवा, सर्दी और माहौल का कोई असर नहीं दिख रहा था। बीच में कभी-कभी वो किताब से नजर हटाकर शून्य में ताकता और फिर अपनी किताब में खो जाता। ट्रेन को चले आधा घंटा हो चला था। नए लड़के ने जैकेट वाले से बात शुरू करने के लिए तीन बार अलग-अलग समयों पर हेल्लो बोला था लेकिन जैकेट वाले के कानों पर जूं तक न रेंगी, जैकेट वाले को तो शायद दुनिया की किसी भी चीज़ से कोई मतलब ही नहीं था।
लेकिन जैकेट वाले के रहस्यमयी व्यक्तित्व में ऐसा कोई जादू था कि नये लड़के ने उससे बात करने की आखिरी और पुरजोर कोशिश की।
"किससे मुक्त होना चाहते हो मित्र?" किताब के शीर्षक को देखते हुए नए लड़के ने जैकेट वाले से पूछा।
जैकेट वाले के चेहरे की भाव-भंगिमा में थोड़ा सा बदलाव आया लेकिन बिना किताब से नजर उठाये उसने केवल तीन शब्द कहे, "इस लोक से।"
"इस लोक से मुक्त होना चाहते हो तो गीता पढ़ो मित्र।" नया लड़का अपना ज्ञान बघारता हुआ बोला।
"गीता पढ़कर केवल जिन्दा मनुष्यों को मुक्ति मिलती है।" जैकेट वाले ने बिना किताब से नजर हटाये फिर उत्तर दिया।
"तभी तो कह रहा हूँ कि आपको भी गीता पढ़कर मुक्ति का रास्ता पता चल जायेगा।" नया लड़का बोला।
"तुम कैसे कह सकते हो कि गीता पढ़कर मुझे मुक्ति मिल जायेगी?" जैकेट वाले ने पूछा।
"क्योंकि हरेक को मिलती है। ऐसा ही कहते हैं।" नया लड़का बोला।
"तुमने शायद मेरे शब्दों पर गौर नहीं किया, गीता केवल जीवित लोगों की मुक्ति का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।" जैकेट वाला किताब पढ़ते हुए बोला।
जैकेट वाले की निगाह किताब से हट ही नहीं रही थी और उसका हाथ बार-बार उसकी आँखों पर पहुँच जाता था और उसके शब्द उसके गले से रुक-रुक कर आ रहे थे।
उसका जवाब सुनकर नये लड़के ने थोड़ा घबराकर कहा, "आप भी तो जिन्दा हो।"
जबाब में उसे केवल एक वाक्य सुनाई दिया, "नहीं, मैं जिन्दा नहीं हूँ। मैं मृतात्मा हूँ।" इस जवाब के साथ जैकेट वाले ने पहली बार नए लड़के की तरफ देखा था। जैकेट वाले की सुर्ख लाल आँखे उस कदरन मंद प्रकाश में भी सुर्ख लालिमा युक्त थीं। माहौल संजीदा हो चुका था, नया लड़का उसके जवाब से या उसकी सुर्ख लाल आँखों से घबरा गया था लेकिन नए लड़के ने हिम्मत से जबाव दिया, "क्यों मजाक कर रहे हो भाई? मैं इन बातों को नहीं मानता।"
"मान जाओगे , आज मान जाओगे। मेरी कहानी सुनना पसंद करोगे?" जैकेट वाले ने उससे पूछा और जवाब में उसकी सहमति से हिलती हुयी गर्दन देखकर फिर कहा, "आज से ठीक छः महीने पहले मुझे इसी ट्रेन में, और इसी सीट पर चाकू घोंपा गया था।"
इतना कहकर जैकेट वाले ने अपनी जैकेट खोली और शर्ट ऊपर की। उसके पेट पर बीच में एक पट्टी मेडिकल टेप की मदद से चिपकी हुयी थी। उसने ऊनी कहानी जारी रखी। "इस ट्रेन में लुटेरे आये थे और अपना डर बनाने को उन्होंने मेरे पेट में खंजर भोंक दिया था। अस्पताल तक जाते-जाते मेरी मौत हो चुकी थी लेकिन आज भी मेरे सपने अधूरे हैं। इसी वजह से मुझे मुक्ति नहीं मिल रही।"
नया लड़का अपनी किस्मत को कोसता हुआ बोला, "भाई आपकी बात भले ही सत्य हो लेकिन मैं इन बातों पर विश्वाश नहीं करता।"
"कैसे विश्वाश करोगे? अगर मैं इस ट्रेन की गति धीमी कर दूं तो करोगे?" इतना कहकर जैकेट वाले ने अपनी लाल आँखों से इमरजेंसी चैन को घूरा और ट्रेन की स्पीड धीमी होने लगी, 120 की रफ़्तार से दौड़ती हुयी ट्रेन अब 30 की रफ्तार से दौड़ रही थी।
नए लड़के की आँखों में डर साफ़ नज़र आ रहा था। इतनी सर्दी में भी उसके माथे पर पसीने की बूँदें झलक आयीं थीं। जैकेट वाला उसे एकटक देखते हुए फिर बोला, "मैं बिना हाथ हिलाये इस मंद प्रकाशयुक्त ट्रेन को जगमग कर दूँ तो विश्वास करोगे?" इतना कहकर जेकेट वाले ने केबिन में जलते हुए एकमात्र बल्ब की ओर कुछ क्षण एकटक घूरा और केबिन सहित पूरे कूपे में बंद पड़ी बड़ी ट्यूबलाइटें जल उठी। जो की वाकई उस तथाकथित मृतात्मा की शक्तियों का नमूनाभर लग रहा था। नए लड़के के चेहरे पर की खौंफ की अधिकता अब साफ़ नज़र आ रही थी, और जैकेट वाला था कि उसे एकटक घूरे ही जा रहा था। तेज प्रकाश में जैकेट वाले की लाल आँखे और पीला चेहरा माहौल की दहशत में एक अजीब सा रंग घोल रहे थे। अपनी अजीब सी आवाज में जैकेट वाला नए लड़के से फिर संबोधित हुआ, "विश्वास हुआ?"

नए लड़के ने गर्दन हिलाकर अपनी सहमति दर्शायी।
"डर तो नहीं लग रहा?" जैकेट वाले ने पूछा। "अगर डर लग रहा हो तो मन ही मन किसी मददगार को पुकारो। तब तक मैं ट्रेन की रफ़्तार तेज कर दूँ।" इतना कहकर जैकेट वाला इमरजेंसी चैन की तरफ घूरने लगा। नए लड़के ने मन ही मन शायद किसी मददगार को पुकारा था क्योंकि अचानक कहीं से एक टीसी वहाँ आया और नए लड़के की तरफ मुखातिब हुआ ही था कि नए लड़के ने उसे अपनी टिकट दिखाकर इतना कहा क़ि "दिल्ली उतरना है।" और टीसी वहाँ से आगे बढ़ गया। टीसी ने जैकेट वाले की तरफ नजर ही नहीं डाली जैसे कि वो उसको दिखाई ही नहीं दे रहा था। इससे नया लड़का और ज्यादा आंदोलित हो गया था। जैकेट वाले के घूरने से ट्रेन की रफ़्तार भी अब बढ़ गयी थी। ट्रेन अपनी सामान्य रफ़्तार से दौड़ रही थी। नया लड़का घबराया हुआ था वो वहाँ से जाना चाहता था लेकिन किसी अज्ञातभावना वश वहां से उठ नहीं पा रहा था। जैकेट वाले ने बल्बों को घूरकर तेज रोशनी को भी हल्की रोशनी में तब्दील कर दिया था।
"डरो मत, मैं किसी को कोई नुकसान नहीं पहुँचाता। लेकिन क्या मेरा एक काम करोगे?" जैकेट वाले ने अपनी विशेष आवाज में उससे प्रार्थना सी की।
"क्या! कैसा काम?"
"मेरे घर का पता और फोन नम्बर लिखो और या तो वहां जाकर या फोन करकर उनसे कहना कि इस लोक से मेरी मुक्ति  के लिए कुछ प्रयास करें।" इतना कहकर जैकेट वाले ने नए लड़के को दिल्ली का एक पता और फ़ोन नम्बर लिखाया।
फिर दोनों का सफ़र शांति से कटा, जैकेट वाला अपनी किताब में व्यस्त रहा और नया लड़का किसी सोच में डूबा रहा था। ट्रेन की गति अब मंद होने लगी थी। मथुरा जंक्शन नज़दीक आ रहा था।
"अगर तुम मृतात्मा हो तो मुझे दिखाई क्यों दे रहे हो?" नये लड़के ने प्रश्न किया।
"क्योंकि जल्द ही तुम भी एक मृतात्मा बनने वाले हो।" जैकेट वाले ने अपनी सुर्ख लाल आँखों से घूरते हुए उसे जवाब दिया। जैकेट वाले के जवाब को सुनकर नया लड़का वहाँ एक पल भी नहीं ठहरा और ट्रेन के पूरी तरह रुकने से पहले ही उस केबिन से क्या उस डिब्बे से ही गायब हो चुका था। जैकेट वाली मृतात्मा के चेहरे पर अब संतुष्टि के भाव थे। दिल्ली अभी दूर थी और किताब भी आधी बाकी थी।
खैर उस नए लड़के की तरह अगर आप भी आत्मा-वात्मा पर विश्वास करने लगे हैं तो मत करो क्योंकि कहानी का अगला हिस्सा आपके विश्वास को हिला देगा क्योंकि ये जेकेट वाला लड़का मैं ही था जो आपको ये कहानी सुना रहा है। क्या कहा? मैं कौन हूँ? तो बस इतना समझ लो कि आपके अपने आस-पास 23-24 साल का जो लड़का दिखाई दे रहा हो बस उस जैसा ही हूँ और जिन्दा हूँ, मृतात्मा नहीं। अब क्या कोई किसी से मजाक भी नहीं कर सकता। हाँ जी ये मज़ाक थी। कैसे? तो आगे सुनो वो ही बता रहा हूँ।
दिल्ली में रहता हूँ बचपन से एक ही शौक था एक्टिंग करना और इसी वजह से ग्वालियर के एक इंस्टिट्यूट में पार्ट टाइम एक्टिंग सीखने जाता था वो भी शनिवार और रविवार को। हफ्ते में केवल दो दिन ही सिखाया जाता था। शनिवार को सुबह पहुँचता था और रविवार की रात लौटता था। पिछले आठ महीनों से एक ही ट्रेन से जाना और एक ही ट्रेन से लौटना, मतलब दोनों ट्रेनों की पूरी जानकारी और उस रूट की सारी डिटेल्स मुझे मुँह जवानी याद थी। जैसे ही उस लड़के ने मुझे हाय और हेल्लो कहा था मुझे एहसास हो गया था कि अगर जवाव दिया तो वो चिपक जायेगा और मैं अपनी किताब को तन्मयता से नहीं पढ़ पाऊंगा, इसलिए मैंने उसे पूरी तरह नजरअंदाज किया। लेकिन पेट पर अभी हाल फिलहाल हुआ एक फोड़ा, मुझे शाम को अचानक हुआ आई फ्लू और मेरी किताब का शीर्षक इस घटना का कारण बने थे। तीन बार अवहेलित करने के बाद भी जब उसने चौथी बार बात की और वो भी किताब के शीर्षक के बारे में तो बस उसको लपेटने की पूरी स्क्रिप्ट मेरे दिमाग में आ चुकी थी। अपने पेट के फोड़े पर लगी पट्टी और टेप के कारण मैंने अपनी मौत की कहानी रच दी थी और बादबाकी पूरा खेल टाइमिंग का था जैसे ही उसने मुझसे पूछा था कि "किससे मुक्त होना चाहते हो" उसके कुछ देर बाद ही कमजोर पुल आने वाला था जिस पर ट्रेन बहुत धीमी चलती थी। मैंने उसका फायदा उठाया और चैन को खामखा घूरकर उस लड़के की नजरों में मैंने ट्रेन की रफ़्तार धीमी कर दी थी और उसके बाद आगरा से सवार सवारियों को चेक करने को एक टीसी आता था जो की उसका स्थापित रूटीन था और आने से कुछ देर पहले सारी लाइट जलवा कर आता था। इससे मैंने अपनी निगाहों से ही ट्रेन में रोशनी बढ़ा दी थी। इसके बाद ट्रेन की गति बढ़ती थी और टीसी आ जाता था। पुल पार होने पर ट्रेन की रफ़्तार खुद ही बढ़ जाती थी लेकिन उस नए लड़के की नजरों में रफ़्तार भी मैंने अपनी आँखों से तेज की थी और टीसी तो आता ही इसलिये मैंने उसको मन ही मन मदद बुलाने को बोला था। टीसी से मेरी पिछले आठ महीनों की मुलाकात थी और ट्रेन में सवार होने से पहले मेरी उससे हर बार बात होती थी इसलिए ट्रेन में अपना काम जल्दी निबटाने के चक्कर में वो मुझे अवहेलित कर देता था। टीसी के चेक करते के बाद लाइट खुदबखुद कम हो जाती थीं और वो समय भी मुझको याद था क़ि लाइट कब कम होती हैं। बस सारा खेल एक्यूरेट टाइमिंग और मेरी एक्टिंग का था जिस पर मैं खरा उतरा था। दिल्ली तक में अपनी किताब बिना किसी व्यवधान के पढ़ते हुए गया था। आप सोच रहे होंगे कि मैंने ऐसा क्यों किया? जबाव बहुत सरल है। आंखें eyeflu से बेहाल थीं , किताब बहुत रोचक थी और अगर मैंने किसी किताब को पढ़ना शुरू कर दिया तो मैं उसे ख़त्म करके ही उठता था इसलिए मैं कोई व्यवधान नहीं चाहता था। अगर वो लड़का इस कहानी को कभी पढ़ पाया तो उससे माफ़ी की याचना के साथ।
समाप्त।

© सुनीत शर्मा


Wednesday, 14 March 2018

#ट्रिंग_ट्रिंग

"होली पर क्यों नहीं आये? पता है, 10 बजे से 2 बजे तक वहीँ बालकॉनी में खड़ी रही थी।"

"आये थे हम। लेकिन तुमको अपने फ़ोन से ही फुरसत नहीं थी। हम वहाँ, सामने के चबूतरे पर 10 मिनट बैठे रहे और तुम्हारी सलोनी सी सूरत देख कर लौट लिये बस।"

"हौ! थोढ़ा इंतज़ार नहीं कर सकते थे क्या? मम्मी का फ़ोन आ गया था।"

"किया तो था 10 मिनट किया था, इतना तो हम बस या ट्रेन का भी न करते। तुमको तो मालूम है।"

"मैं कोई बस या ट्रेन नहीं हूँ मिस्टर! समझे।"

"हाँ जी, समझ गए, ज्यादा ही समझ गए। खैर ये बताइयेगा कि क्या समस्या है तुमको कि जिसका समाधान नहीं मिल पा रहा।"

"समस्या? मैंने तो नहीं कहा कि मुझको कोई समस्या है। कोई समस्या नहीं है मुझे। मैं तो मस्त हूँ।"

"बतख के बच्चों को तैरना आज भी न सिखाओ। शब्द, समय, और परिस्थितियों ने हमको बहुत कुछ सिखाया है। बाल सफ़ेद होने में सालों लगते हैं, काले तो 30 मिनट में हो जाते हैं और हमारे तो ढाढ़ी के भी सफ़ेद होने लगे हैं।"

"कुछ ज्यादा ही तेज़ हो गए हो। खैर सच बताऊँ तो समस्या है और उसका समाधान मुझे आप ही सुझा सकते हो।"

"क्यों, हम क्यों सुझा सकते हैं? और भी कई लोग होंगे।"

"BECAUSE, I KNOW, THE WORLD CALLED YOU TROUBLSHOOTER."

"हाहा! लेकिन अब हम TROUBLESHOOTER नहीं हैं। अब हम ज्यादा दिमाग नहीं लगाते, हम आपकी कोई मदद न कर पायेगें। सॉरी!"

"हेल्प करो या न करो, कोई दिक्कत नहीं है मुझे लेकिन ये झूठ तो न बोलो कि अब आप दिमाग नहीं लगाते।"

"अरे वास्तव में, अब ज्यादा नहीं सोच पाता मैं।"

"हाँ, नहीं सोच पाते ये तो तभी मालूम हो गया था जब तुमने मुझसे समस्या के बारे में पूछा था। न बीच में मत बोलो, पहले सुन लो। अगर सोचते नहीं हो तो कैसे पता चल गया कि मैं किसी समस्या में हूँ? जीनियस बोलती थी, अब भी बोलती हूँ। खैर अब तुमसे कोई मदद नहीं चाहिए क्यूंकि तुम करना ही नहीं चाहते। शुभरात्रि!"

"अरे ठहरो! फोन मत काटो, रुको तो सही।"

"बोलो।"

"समस्या तुम्हारी पारिवारिक और व्यक्तिगत न होती तो हम मदद कर देते लेकिन तुम्हारे व्यक्तिगत मामले में हमारी दखलंदाजी सही नहीं।"

"तुमको कैसे मालूम चला कि समस्या व्यक्तिगत है?"

"जीनियस शब्द भी सार्थक करना पड़ता है। है न?"

"हम्म। घुमाओ मत, जल्दी बताओ कि कैसे अंदाज़ा लगाया?"

"अरे बहुत सिंपल था। समस्या अगर पारिवारिक न होती तो तुम परिवार से मशवरा करतीं मुझसे नहीं और जो पिछली तीन बार हमारी और तुम्हारी संछिप्त सी मुलाक़ात हुयी थी पिछले पांच सालों में, तब तो कोई फोन न आया था तुम्हारा।"

"ज्यादा दिमाग न लगाओ, मेरे पास तुम्हारा फ़ोन नंबर नहीं था।"

"न तुम खोज सकतीं थी? खैर लड़ो मत और समस्या बताओ।"

"क्या अपने आप तक रखोगे? किसी को बताओगे तो नहीं।"

"अरे नहीं बताऊंगा, बस फेसबुक पर लिख दूंगा😊। कमाल करती हो तुम भी। तुम और तुमसे जुड़ी सारी बातें राज़ थीं, राज़ हैं और राज़ रहेंगी। इतना तो तुम भी जानती हो।"

"हाँ, जानती तो हूँ। लेकिन डर तो लगता है न।"

"डरो, डरना जरूरी होता है सुरक्षित जीवन यापन के लिए। खैर अपनी समस्या बताओ जल्दी।"

"बता रही हूँ। आज तो फ्री हूँ।"

"मालूम है तभी तो फ़ोन ऐसे समय पर किया है मैनें।"

"अच्छा जी!, खैर में पिछले तीन महीनों से परेशान हूँ। परेशानी यह है कि ......"
टूँ.. टूँ...टूँ

To be continued.....

#ट्रिंग_ट्रिंग

"पहली घंटी पर ही फ़ोन उठा लिया आज भी। अब तक नहीं बदले न!"

"तुमने कितनी कोशिश की थी मुझको बदलने की! जब तब नहीं बदला तो अब कैसे बदल सकता हूँ।"

"अच्छा!"

"हाँ जी। वैसे मुझे मालूम नहीं था कि तुम्हारा फोन है। मालूम होता तो कुछ देर बजने के बाद उठाता।"

"अच्छा! उससे क्या होता?"

"उससे, ये होता कि कम से कम तुमको ये  एहसास हो जाता कि हम भी तनिक बदल गए हैं।"

"वास्तव में नहीं बदले तुम।"

"मैं कोई मौसम थोड़े ही हूँ सो बदल जाऊं! वैसे आज पाँच साल बाद कैसे याद आ गयी हमारी?"

"याद तो हमेशा ही आती है अलबत्ता फोन काफी दिन बाद किया है क्योंकि आज तुमको देखा था सड़क पर। वही बेफिक्र चाल, वही बाज़ की सी झुकी गर्दन, वही ड्रेस सेन्स, वही किसी पर ध्यान न देना, वही दोनों हाथों से चुटकी बजाते हुए चले जा रहे थे।"

"अच्छा, वो ध्यान न देने की मेरी पुरानी आदत है। लाल साड़ी में, पल्सर 180 cc बाइक पर अपने पतिदेव के साथ जिन्होंने हरे लेंस का चश्मा लगा रखा था, सफ़ेद शर्ट, नीली जीन्स, काले लैदर के जूते; कहो तो ब्रांड भी बता दूंगा। मैने कसम से ध्यान ही नहीं दिया।"

"हाहाहा, कसम से यही कहलवाना था तुमसे। तभी तो कहा था बाज़ की तरह झुकी गर्दन।"

"अच्छा, मेरी आदतें और स्किल्स आज तक याद हैं तुमको- जानकर प्रसन्नता हुयी। वैसे खूबसूरत लग रहीं थीं आज, वजन बढ़ने से खूबसूरती भी बढ़ गयी है तुम्हारी।"

"वास्तव में नहीं बदले, सीधा कह देते कि मोटी हो गयी हूँ।"

"अगर सीधा कहता तो बुरा न मान जातीं तुम। इसलिए थोडा घुमा दिया शब्दों को।"

"तुम्हारी शब्दों को घुमाने की इसी आदत की वजह से ही तो आज का ये दिन देख रहीं हूँ। वरना आज कुछ और होते हम। और आज ये फोन करने की नौबत ही न आती। आज सफ़ेद शर्ट और नीली जीन्स में तुम होते, पल्सर पर नहीं तुम्हारी पसंदीदा लाल अवेंजर पर।"

"अच्छा, रहने दो, बातें न बनाओ ज्यादा मेरे आगे। मेरी आदतें? कभी खुद की आदतों के बारे में भी सोचा था का? हर समय मेरी आदतें बदलवाने की सोचतीं थीं। ज्यादा किताबें न पढ़ो, आँख और दिमाग दोनों ख़राब होते है। हर चीज़ के बारे में ज्यादा तर्क न लगाओ वरना पागल हो जाओगे। ईश्वर है, जो तुमको और मुझको जिन्दा रखे हुए है और उसी की कृपा से हम एक होंगे।"

"तो क्या, सही ही कहती थी मैं तो।"

"अच्छा, पाँच साल बाद भी मेरी आँखें सही है और दिमाग भी। पागल भी नहीं हुआ माशाअल्लाह। ईश्वर है नहीं लेकिन मैं आज भी जिन्दा हूँ और तुम भी और सबसे बड़ी बात अलग-अलग हैं।"

"कल बात करती हूँ। बेटा जाग गया है और रो रहा है, वो भी आने वाले है।"

" ठीक है, अपना ख्याल रखना, और मेरा नम्बर कहाँ से लिया ये भी बताना कल। गेट खोलो, तुम्हारे वो आ गए।"

"तुमको कैसे पता? अभी गेट खटका है वाकई में।"

"अभी बता दिया तो तुम कल क्यों फ़ोन करोगी? आखिरी बार दो बार मैंने किया था। एक बार तुम्हारी तरफ से हो गया। एक बार कल और करना, और हाँ, तुम्हारी आवाज हम जुलुस के नारों में भी पहचान लेंगे और तुम्हारा फ़ोन पहली घंटी पर ही उठा लेंगे। आज नाराज हैं शायद कल न हों। शुभ रात्रि।"
"शुभ रात्रि।"

Thursday, 14 December 2017

#सत्यघटना (खिचड़ी vs खीर)

मेरे एक मित्र हैं या समझ लीजिए छोटे भाई हैं, अभी कुछ दिन पहले तक मेरे साथी अध्यापक भी थे। ये वाकया करीब दो साल पुराना है और मैं इस मजेदार वाक़ये का प्रत्यक्षदर्शी गवाह।

मेरे इस भाई ने अपना छात्र जीवन होस्टल में ही गुजारा है। पहले 'नवोदय विद्यालय' और फिर 'अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी' । वहां से डिग्री हासिल करके ये भाईसाहब थोड़ा अनुभव हासिल करने के लिए हमारे विद्यालय में इंटरव्यू पास करके बतौर शिक्षक आये और मेरे एक अभिन्न पारस्परिक मित्र के जेरेसाया मेरी इनसे मुलाकात हुई और हमारी इस मुलाकात ने हम तीनों की मित्रता की नयी परिभाषा रची।

खैर, वो दोनों एक ही फ्लैट को शेयर करते थे और मेरा ऱोज का वहाँ आना जाना था क्योंकि हम तीनों ही मिलकर वहां एक कोचिंग सेंटर चलाते थे।

अब आते हैं मुद्दे की बात पर। भारत के जितने भी होस्टलर्स हैं न, पाककला (cooking food) के नाम पर वो दो चीजों में बेहद दक्ष होते हैं- पहले नम्बर पर आती है 'मैगी' और दूसरे नम्बर पर 'तहरी' (पुलाव, खिचड़ी, फ्राइड राइस, नमकीन चावल आदि) । मैं शर्त लगा कर कह सकता हूँ कि खिचड़ी जैसी चीज को भी ये हमारे भाई जैसे होस्टलर्स ऐसा बना सकते हैं कि बस आप इनके शैदाई हो जाओगे। मैं भी इनकी बनायी खिचड़ी का आज भी शैदाई हूँ, क्योंकि इनके हाथ की बनी खिचड़ी मैंने भी बहुत खायी है।

खैर एक छुट्टी वाले दिन जब सारे बैच हमने सुबह 11 बजे तक पढ़ा दिए थे तो हमारे एक मित्र अलीगढ निकल गए और फ्लैट में हम दोनों रह गए। बात हो ही रही थी कि अचानक भाई बोले, "सर, आज खीर खाने का मन कर रहा है।"

तो मैंने कहा, "यहाँ तो किसी होटल में मिलेगी नहीं, भाई।"

हमारा भाई बोला, "आज घर की बनी खीर खाएंगे और यहीं बनाएंगे।"

मैंने उनसे पूछा, "तुमको बनानी तो आती है या नहीं।"

जवाब मिला, "खिचड़ी जैसे बनती है वैसे ही बन जायेगी, बस दाल नहीं डालनी, नमक की जगह चीनी, पानी की जगह दूध और कुछ मेवा डालेंगे।"

जवाब में तर्क था इसलिए मैंने कहा बना लो मैं भी खाऊंगा।

वो तुरंत एक लीटर दूध लेकर आये और तमाम मेवा भी, चावल तो फ्लैट पर मौजूद थे ही। बस उन्होंने चूल्हे पर खीर बनाने रख दी।

और हम दोनों बातों में व्यस्त हो गए। मेरे अनुसार शायद उनको पता था कि खीर बनने में कितना समय लगेगा।

और बातें करते करते जब उन्होंने बताया कि खीर बन चुकी होगी तो हम दोनों रसोई में आये और जब उन्होंने चूल्हे पर मौजूद उस भगौनी पर से प्लेट हटाई तो हमारे भाई का मुंह लटक गया।

क्योंकि खीर जो बनी थी वो बेहद मजेदार बन चुकी थी। बिल्कुल फ्राइड राइस जैसी। चम्मच भी उसमें डालने में हमें मेहनत करनी पड़ रही थी।

पहले उसे देखकर मैं हँसा, फिर वो और शायद अब आप लोग हंस रहे होंगे, बात ही हँसने की थी लेकिन मेरा दिमाग तुरन्त चला और एक नया पाठ मेरे दिमाग में तैयार हो गया था।

खैर, मेरे भाई की खीर बनी थी और, उनकी मेहनत न मैंने जाया जाने दी और उन्होंने। हमने वो खीर छुरी और कांटे से खायी थी।

खैर, अब आप सोच रहे होंगे कि पाठ कौनसा था?

तो जनाब, उस खिचड़ी जैसी खीर को देखकर मेरे दिमाग में तुरंत ये प्रश्न आया कि बनाना तो खीर चाह रहे थे लेकिन बन गयी खिचड़ी। क्यों?

जवाब भी मेरे दिमाग में आ गया कि खिचड़ी खाने वालों (मैं) को यदि खीर खानी है तो तरीके भी खीर बनाने वाले चाहिए। हम दोनों के पास खीर बनाने के सारे साधन मौजूद थे लेकिन हमने खिचड़ी ही खायी थी, क्योंकि हमने अपना तरीका नहीं बदला था।

आप अगर मेरे छात्र हैं, या मेरे मित्र हैं, या मुझसे बड़े हैं तो बस इस घटना से इतना सबक लीजिये कि "परिणाम बदलने हैं तो तरीके भी बदलने पड़ेंगे।"

साधन चाहे कितने भी हों या आप कितने भी अनुभवी हों लेकिन बिना तरीका बदले आप अपने मनवांछित परिणाम नहीं हासिल कर पाएंगे।

लगभग दो महीने बाद बोर्ड की परीक्षाएं हैं, प्यारे छात्रों अगर परिणाम बदलना है तो अपने पढ़ने का तरीका भी बदल दो।

खैर, इस घटना के अगले दिन, शाम को मैंने अपने दोनों अजीजों को घर पर निमंत्रित करके कचौड़ी और खीर खिलवाई थी।

शुभ रात्रि। नव वर्ष और क्रिसमस की अग्रिम शुभकामनाओं सहित और भाई से माफ़ी की गुंजाईश सहित।


Friday, 3 November 2017

बदकिस्मत क़ातिल।

उस उमस एवं गर्मी से भरी मई के महीने में, शाम 5 बजे, सुब्रोजित बासु उर्फ़ मिकी, तीसरे क़त्ल की तैयारी कर रहा था। क़त्ल करते रहना कितना खतरनाक हो सकता है, उसे इस बात का पूरी तरह एहसास था। हालांकि पहले दो क़त्ल उसने खुद नहीं किये थे परंतु परोक्ष रूप में उन दोनों कत्लों में उसका पूरा हस्तक्षेप था। उसकी नजरों में उसकी आज की योजना पूरी तरह फूलप्रूफ थी लेकिन वक़्त और नसीब कब किसको धोखा दे दें, वो इस बात से कतई बेख़बर था।

13 मई मेरे लिए आखिरकार खुशकिस्मत दिन साबित हुआ था, इस दिन मैंने बतौर प्राइवेट डिटेक्टिव अपनी जिंदगी का पहला केस सॉल्व किया था। एक महीने की भागदौड़ से अंततः मुझको निजात मिल ही गयी थी। कुल मिलाकर करीब पचपन हज़ार रुपये मैंने अपने क्लाइंट से इस केस में वसूले थे। अगर खर्चे को निकाल दिया जाए तो भी तीस हज़ार रुपये बचत, पहले केस की एवज में कोई घाटे का सौदा नहीं था। मेरी प्राइवेट टीचिंग की जॉब से तो काफी अच्छा था, जो मैंने अभी दो महीने पहले ही छोड़ी थी, बशर्ते हर महीने कोई केस मिलता रहे। चूँकि आज कोई काम नहीं था इसलिये आज मेरा शाम तक आराम करने का मन था और देर शाम मथुरा के प्रसिद्ध मंदिरों का दर्शन करने का भी मन था। फिलहाल घडी में पाँच बजे हुए थे और मई के महीने की उमस मेरे होटल के कमरे में चलता हुआ फटेहाल AC भी कम नहीं कर पा रहा था। मेरे क्लाइंट की मार्फ़त इस होटल का अगले दिन बारह बजे तक का किराया एडवांस में चुकता था। महोली रोड पर स्थित गोवर्धन पैलेस नामक ये होटल एल शेप में बनी हुई औसतन तिमंजिला इमारत थी जो मुख्यतौर पर एक मैरिज होम थी। लेकिन इसकी दूसरी और तीसरी मंजिल बृजदर्शन को आये मुसाफिरों के लिए भी उपलब्ध थीं। मैं इस होटल के प्रवेशद्वार के दायीं तरफ तीसरी मंजिल स्थित एक कमरे में बैठा तीसरी बियर चुसक रहा था जो कि इस उमस भरे मौसम में मुझे गर्मी से फौरी तौर पर राहत दे रही थी। गर्मी की वजह से खाना खाने की इच्छा बिल्कुल भी नहीं थी जो थोड़ा बहुत मैं खा रहा था वो बस बियर के साथ आये स्नैक्स थे। वक्तगुजारी के लिए मैं अपने कमरे की खिड़की पर बैठा अपनी शक्तिशाली दूरबीन से बाहर के नज़ारों का अवलोकन कर रहा था। आसमान में अचानक पीले बादल आ गये थे जो कुछ देर में आने वाली आँधी का घोतक थे। मैंने घड़ी पर निगाह डाली तो अभी 5:30 ही हुए थे। बाहर हवा तेज हो चुकी थी जो कमरे की बंद खिड़की की वजह से मेरे लिए बेअसर थी। हल्की-हल्की बूँदाबाँदी भी शुरू हो चुकी थी। दूरबीन से बाहर झाँकते हुए अचानक मेरी निगाह होटल के प्रवेशद्वार से निकलते हुए एक महिला और पुरुष पर पड़ी जो कि बूँदाबाँदी की वजह से गेट पर कुछ देर खड़े रहे थे। बूँदाबाँदी अब हल्की बारिश में तब्दील हो चुकी थी जिसकी वजह से धूल अब बहुत कम उड़ रही थी। बाहर का दृश्य अब बिल्कुल साफ नजर आ रहा था। महिला के पैर बता रहे थे कि वो दोनों शायद पति-पत्नी थे।  महिला सफ़ेद सूट में थी जिसका दुपटटा उसने आँधी की वजह से अपने चेहरे पर लपेटा हुआ था जबकि पुरुष गोल गले की काली टीशर्ट और जीन्स में था उसकी कद-काठी और बलिष्ठ शरीर उसके रेसलर होने की चुगली कर रहा था। उन दोनों में एक बहस हो रही थी। हल्की बारिश में ही उन्होंने बाहर निकलना उचित समझा। उनकी मंजिल शायद होटल की पार्किंग थी जो कि होटल की मुख्य बिल्डिंग से करीब 150 मीटर दूर थी। मुख्य बिल्डिंग के सामने एक 150 मीटर लंबा लॉन था जो कि शादी वगैरह में सामूहिक भोज के काम आता होगा। राहदारी पर चलते समय उन दोनों में अनबन साफ़ नज़र आ रही थी। मेरी दिलचस्पी उनकी अनबन में नहीं बल्कि उस चेहरे में थी जो कि अब भी दुपटटे से आधा ढका हुआ था। अपनी दूरबीन में नजर गढ़ाए मैं केवल उस एक अदद चेहरे को देखने के लिए ही उन दोनों पर निगाह बनाये हुए था। दूरबीन की क्वालिटी की बाबत मुझे आज पता चला था। 150 मीटर की दूरी के बाबजूद भी मुझे वो दोनों और उन दोनों के बीच होती अनबन साफ़ दिखाई दे रही थी। वो दोनों पार्किंग में खड़ी अपनी कार में बैठ गए लेकिन अगली चार या पाँच मिनट तक कार वहां से टस से मस नहीं हुई। बारिश अब पहले से तेज हो चुकी थी। अचानक कार का पेसेंजर सीट वाला दरवाजा खुला और महिला कार से उतरकर सीधा होटल की ओर तेजी से दौड़ी चली आ रही थी। उसके दौड़ने की वजह या तो तेज बारिश में भीगने से बचना या उन दोनों के बीच की अनबन का झगड़े में तब्दील हो जाना थी, मेरे लिए कहना मुहाल था। दुपटटा अभी भी उस महिला के बालों और चेहरे को ढके हुए था। गेट तक आते-आते वो बारिश से पूरी तरह तर हो चुकी थी। अपनी शक्तिशाली दूरबीन की वजह से मुझे गीले सूट से चिपका हुआ उसका अन्तःवस्त्र भी साफ़ नज़र आ रहा था लेकिन अफ़सोस कि लगातार इतनी देर से देखते रहने के बाबजूद भी मैं उसका चेहरा देखने से महरूम रहा। महिला गेट से अंदर आ गयी थी उधर जब मैंने उनकी कार की तरफ नजर घुमाई तो कार को वहाँ से नदारद पाया।
दूरबीन वहीं एक तरफ रखकर मैंने जब घड़ी की तरफ निगाह डाली तो 5:45 का समय हो चुका था। इधर मेरी तीसरी बियर भी ख़त्म हो चुकी थी और उसका असर अब मुझ पर होने लगा था। मेरे मन में नहाने का विचार आया। कुछ देर अपने मोबाइल में जरूरी नोटिफिकेशन चैक करने के पश्चात् मैं सीधा अटैच्ड बाथरूम में दाखिल हो गया। फ्रेश होकर और नहाकर जब मैं बाथरूम से निकला तो बियर का असर कुछ कम हो गया था। आदतन निगाह जब घडी पर पहुंची तो 6:25 का समय था।

चूँकि कमरे से फिलहाल बाहर जाने का मेरा कोई मन नहीं था इसलिए मैं लोअर और टीशर्ट पहन ही रहा था कि अचानक नजदीक ही कहीं बजते पुलिस के सायरन ने मेरा तुरंत ध्यान खींचा। खिड़की से बाहर देखने पर मैंने पाया कि होटल के प्रवेशद्वार के बायीं तरफ थोड़ी दूर एक भीड़ जमा थी और उसके ऊपर दूसरी मंजिल पर एक खिड़की पूरी खुली हुई थी। वहीँ राहदारी में एक एम्बुलेंस भी खड़ी थी।मेरा मन एक अंजान आशंका से लरज गया। आनन फानन मैंने जीन्स और टीशर्ट पहनी, जैसे तैसे संवर सके अपने बाल सँवारे और तुरन्त नीचे की ओर भागा। नीचे पहुँच कर मुझे मालूम चला कि दूसरी मंजिल से एक महिला ने कूदकर ख़ुदकुशी कर ली है एम्बुलेंस के साथ आये डॉ ने उसकी मौत की पुष्टि की है। बारिश अब थम चुकी थी। भीड़ के नजदीक पहुँचने पर मुझे मालूम चला कि पुलिसवालों ने लाश का पंचनामा वगैरह करके लाश को एम्बुलेंस में रखवा दिया है ताकि जल्द से जल्द पोस्टमॉर्टम हो सके। लोकल पुलिस इसे सीधा सादा ख़ुदकुशी का केस मान चुकी थी। लोकल थाना नजदीक ही था इसलिए एक खबर पर पुलिस और एम्बुलेंस तुरंत वहाँ पहुंची थीं। मुझे मृतका की एक झलक तक नसीब नहीं हुई अलबत्ता गिरने की जगह पर थोड़ा खून जरूर नजर आ रहा था। वहीँ थोड़ी सी पूछताछ के बाद मुझे पता चला की लाश की शिनाख्त हो चुकी है और मृतका उसी होटल में अपने पति के साथ ठहरी हुई थी। मृतका का नाम प्रिया बासु था और उसके पति का नाम मिकी बासु था जो कि दिल्ली से मथुरा दर्शन के लिए आज ही आये थे। ठीक छः बजे मृतका ने अपनी खिड़की से छलांग लगाई है लेकिन उसे गिरते हुए किसी ने नहीं देखा। लॉन की घास काटने वाले माली ने जब उसके जमीन से टकराने की आवाज सुनी तो उसने सबको बुलाया। मृतका के पति को फोन किया जा चुका था। तभी राहदारी में एक कार दाखिल हुयी जिसे मैंने तुरंत पहचाना। ये वही कार थी जो अभी पैंतालीस मिनट पहले मेरी नजर के दायरे में थी यानि दोनों में झगड़ा इतना बढ़ गया था कि नौबत ख़ुदकुशी तक आ गयी थी। अपनी कार से उतर कर मृतका का खाविंद सीधा वहां मौजूद पुलिस अफसर के पास पहुँचा और पूछताछ करने लगा। उसके चेहरे पर फटकार बरस रही थी। अफसर की वर्दी पर लगे दो सितारे और उसके हाव-भाव दर्शा रहे थे कि वो नया भर्ती हुआ सब इंस्पेक्टर है। उसकी नेम प्लेट से मैंने उसका नाम पढ़ा 'श्रीकांत गौतम'। नाम से मेरे जेहन में एक घंटी बजी...मैंने उसके चेहरे को गौर से देखा और तुरंत पहचाना, ये तो मेरा पढ़ाया हुआ छात्र है। फेस बुक के माध्यम से मुझे पता तो था कि श्रीकांत पुलिस अफसर बन चुका है लेकिन उससे एक अर्से बाद मेरी मुलाकात ऐसे माहौल में होगी ये मेरी कल्पनाओं से परे था। मुझे अंदर ही अंदर एक ख़ुशी हुई। करीब पंद्रह मिनट तक मृतका का खाविंद श्रीकांत से उलझा रहा। जैसे ही श्रीकांत उससे फारिग हुआ मैं श्रीकांत के नजदीक पहुँचा। उसने मुझे तुरंत पहचाना और अभिवादन स्वरुप अपनी गर्दन हिलायी।

"और श्रीकांत कैसे हो?" मैंने उसके अभिवादन को स्वीकार करते हुए उससे पूछा।

"आपका आशीर्वाद है सर, बिल्कुल मज़े में हूँ। लेकिन आप यहाँ कैसे?"

जवाब में मैंने उसे वहां अपनी मौजूदगी की वजह तफ्सील से बतायी साथ में यह भी बताया कि अभी कुछ देर पहले मियाँ बीबी के बीच हुए झगडे का मैं चश्मदीद था। फिर इस घटना के बारे में मैंने श्रीकांत से पूरे तथ्य जानने चाहे।

श्रीकांत ने मुझे अपने साथ आने का इशारा किया। मैं, श्रीकांत, मिकी और दो सिपाही हम सब ऊपर दूसरी मंजिल पर स्थित मिकी के कमरे पर पहुँचे। कमरा अंदर से लॉक था। मास्टर चाबी से खुलवाने पर कमरा बिल्कुल सही हालत में पाया गया। प्रिया का दुपट्टा वहीँ बेड पर पड़ा था। कमरे में एक सरसरी नजर डालने के बाद हम सब नीचे आ गए। मिकी अपनी गाड़ी में सवार होकर एम्बुलेंस के पीछे चला गया।

फिर श्रीकांत ने केस की बाबत मुझे जो बताया वो संक्षिप्त में इस प्रकार था।  मृतका और उसका शौहर आज दोपहर को ही मथुरा और वृन्दावन घूमने दिल्ली से आये थे। शौहर का नाम सुब्रोजित वासु था लेकिन उसके जानने वाले सब उसको मिकी के नाम से पुकारते थे। उसकी दिल्ली में एक गारमेंट शॉप थी। मिकी एक राष्ट्रस्तरीय रेसलर भी था और रेसलिंग में कई व्यक़्क्तिगत पदक भी जीत चुका था। प्रिया आजकल कुछ डिप्रेसन में थी जिसकी वजह से वो उसे घुमाने लाया था। होटल से दोनों शॉपिंग के लिए निकल रहे थे कि दोनों में अचानक झगड़ा शुरू हो गया और कार तक पहुँचते ही झगड़ा इतना बढ़ गया कि प्रिया कार से उतर कर होटल में आ गयी और मिकी अकेला ही शॉपिंग के लिए निकल गया। फ़ोन पर उसे पता चला कि प्रिया ने खिड़की से कूदकर ख़ुदकुशी कर ली है तो वो तुरंत यहाँ लौट आया।

"तुम्हारा विवेक क्या कहता है?" मैंने श्रीकांत से जानना चाहा।

"सर, सीधा सा ख़ुदकुशी का केस है और सारी चीजें कल पोस्टमॉर्टम के बाद साफ़ हो जाएंगी।"

"ख़ुदकुशी करने वाले कभी दूसरी मंजिल से छलांग नहीं लगाते।" मेरे इतना कहते ही मुझे उसकी निगाहों में शंशय की एक हल्की सी झलक प्रतीत हुयी। तभी उसके मोबाइल की घंटी बजी, उसने फोन उठाया और बात करने लगा। बात करने के बाद उसने मुझे बताया कि उसके एक अफसर का फ़ोन था तो उसे फ़ौरन जाना था। उसने अपना फोन नम्बर मुझे दिया और मेरा नम्बर अपने फ़ोन में सेव करके कहा। "सर इस केस पर आपसे कल चर्चा करूँगा तब तक पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट भी आ जायेगी।" इतना कहकर उसने मुझसे विदा ली।

मथुरा घूमकर में देररात होटल पहुँचा और अपने कमरे में आकर लेट गया। बीते हुए घटनाक्रम की रील मेरे दिमाग में अपने आप चल रही थी। नींद ने कब मुझे अपनी आगोश में ले लिया मुझे पता ही नहीं चला। अगले रोज मेरे बजते हुये फोन ने मुझे नींद से जगाया। घड़ी में देखा तो नौ बजने वाले थे। फोन श्रीकांत का था। उसने बताया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ चुकी है और मौत गर्दन की हड्डी टूटने की वजह से हुयी है। डॉ ने मौत का समय भी 5:30 और 6:15 के बीच का निर्धारित किया है। लेकिन उसके मुझे फोन करने की असल वजह ये थी कि वो मुझे अपने साथ लंच के लिए आमंत्रित करना चाहता था। उसके आमंत्रण को मैंने सहर्ष स्वीकार कर लिया। उसने ठीक बारह बजे मुझे पिक करने के लिए गाड़ी भेजने का वायदा किया और फोन काट दिया।

ठीक सवा बारह बजे मैं और श्रीकांत ब्रजवासी होटल में लंच टेबल पर आमने सामने बैठे हुए थे। कुछ औपचारिक बातों के बाद हमारी बातें इस केस की तरफ मुड़ चुकीं थी। श्रीकांत ने मिकी के बारे में कल शाम को ही दिल्ली पुलिस से जानकारी मांगी थी और जवाब में जो मेल आया था उसके अनुसार मिकी स्वभाव का बेहद मिलनसार और ठन्डे दिमाग का मालिक था। हालाँकि प्रिया से उसकी अनबन चलती रहती थी। ये अनबन प्रिया की बीमारी की वजह से थी। दोनों की शादी को तीन साल हो चुके थे लेकिन दोनों अभी बेऔलाद थे। हालाँकि इन तीन सालों में प्रिया का दो बार अबॉर्शन हो चुका था और इसी वजह से प्रिया डिप्रेशन में थी।

"लेकिन ख़ुदकुशी करने के लिए कोई दूसरी मंजिल से क्यों कूदेगा? इससे तो मरने के चांस बहुत कम होंगे। मैंने तो प्रिया को उसकी ख़ुदकुशी से कुछ देर पहले ही देखा था। अगर उसे ख़ुदकुशी करनी ही थी तो वो अपने दुपटटे का फंदा लगा सकती थी। उसका दुपटटा भी उनके कमरे में मौजूद पाया गया था।" मैंने श्रीकांत से कहा।

"सर अब मरने वाले को तो मरना है, चाहे लटक कर मरे या कूदकर और पोस्टमॉर्टम की रिपोर्ट भी तो ख़ुदकुशी की तरफ इशारा कर रही है।"

"तुम्हारे पास लाश की कोई फोटो है?

"फ़िलहाल तो नहीं। लेकिन अभी पाँच मिनट में आ सकती है।"

"मंगवाओ।"

मेरे इतना कहते ही श्रीकांत ने एक फोन किया और दूसरे ही मिनट उसके फोन में लाश की तस्वीरें आ गईं थीं। उसने तस्वीरें मुझे दिखाईं। पहली तस्वीर में लाश पेट के बल जमीन पर पड़ी हुई थी और सर के नीचे खून था जो कि बारिश के पानी में बह रहा था। मैंने फोटो को ज़ूम किया। लेकिन कुछ नतीजा न निकला। श्रीकांत ने मुझे बताया कि लाश इसी स्थिति में पायी गयी थी। दूसरी तस्वीर में लाश पीठ के बल थी और उसके फटे माथे में से खून रिसता हुआ दिखाई दे रहा था जो कि घाव की एवज में काफी कम अनुपात में था। शायद बारिश की वजह से धुल गया हो, मैंने मन ही मन सोचा। मैंने स्वभावानुसार इस फोटो को भी ज़ूम किया। जिस चेहरे को देखने की खातिर कल मैं मरा जा रहा था आज मैं उसी मरे हुए चेहरे को देख रहा था। सरसरी तौर पर देखने पर तो मुझे कुछ महसूस नहीं हुआ लेकिन जब मैंने फोटो को गौर से देखा तो मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं। ये साफ-साफ क़त्ल का केस था। क़त्ल कैसे हुआ मेरी समझ में आ चुका था।

"इस समय मिकी कहाँ होगा?" मैंने श्रीकांत से पूछा।

"अभी तो वो हॉस्पिटल होगा। लाश क्लेम कर रहा होगा या कागजी करवाई पूरी करा रहा होगा। क्यों?"

"श्रीकांत, अभी किसी को होटल भेजकर एक बात का पता कराओ।"

मैंने श्रीकांत को जरूरी निर्देश दिए। 10 मिनट बाद होटल से जो जवाब आया वो मेरी क़त्ल की थ्योरी की पुष्टि करता था। मैंने श्रीकांत को अपनी योजना समझाई और उसको तुरंत मिकी को हिरासत में लिए जाने का आदेश देने को कहा। अगले पांच मिनट बाद श्रीकांत के पास फोन आया कि मिकी को हिरासत में लिया जा चुका है। हमने अपना लंच जल्दी से निबटाया और वहां से सीधा होटल पहुँचे। होटल के रिसेप्शन से हमने जरूरी जानकारी ली  और सीधा दूसरी मंजिल स्थित एक दूसरे कमरे में पहुंचे। वहाँ ठहरे मुसाफिर से हमने पाँच मिनट पूछताछ की। पूछताछ करने के बाद उस मुसाफिर को हमने लोकल थाने से बुलाये दो सिपाहियों के हवाले किया और होटल से तुरंत थाने पहुंचे। मिकी को हमने दो सिपाहियों से घिरा हुआ अंदर कमरे की एक कुर्सी पर बैठा हुआ पाया।

हमको देखते ही उसने तुरंत श्रीकांत से कहा, "मुझे इस तरह बंदी बनाने का क्या औचित्य है?

जवाब में श्रीकांत ने अपनी पुलिसिया टोन में कहा, "तुम पर अपनी पत्नी की हत्या का आरोप है।"

"क्या सुबूत है तुम्हारे पास? वो तो ख़ुदकुशी का केस है।"

"सुबूत भी देंगे। पहले ये बताओ कि डॉली को जानते हो? मेरे इतना पूछते ही मिकी का चेहरा पीला पड़ गया।

मैंने बोलना जारी रखा, "तुम्हारा चेहरा बता रहा है मिकी कि तुम डॉली को अच्छी तरह से जानते हो और तुमको ये भी पता चल गया होगा कि हम भी अब सब जानते हैं। वैसे बहुत अच्छा प्लान बनाया था एक क़त्ल को ख़ुदकुशी साबित करने के लिए तुमने। लेकिन तुम्हारी बदकिस्मती कि तुम अपने प्लान में कामयाब न हो पाए। ये केवल तुम्हारी बदकिस्मती ही थी कि इधर तुम्हारा प्लान परवान चढ़ रहा था और उधर बारिश न जाने कहाँ से आ गयी। अगर बारिश नहीं आती तो तुम साफ़ साफ़ बच निकलते। तुम्हारी योजना वाकई फूलप्रूफ थी। प्रिया का क़त्ल तो तुम 5:30 से पहले ही कर चुके थे। चाहे लाश भले ही छः बजे बरामद हुई हो। हैं न?"

"हाँ! किया है मैंने प्रिया का क़त्ल। चढ़ा दो मुझे फांसी पर।" वो चिल्ला रहा था और रो भी रहा था।

उसे उसी कमरे में छोड़कर हम बाहर ऑफिस में आ गए। श्रीकांत पर अब सस्पेंस बर्दाश्त नहीं हो रहा था। उसने मुझसे बेसब्र लहजे में पूछा। "सर बताओ तो, आखिर ये माज़रा क्या है?"

"श्रीकांत, इसने अपनी प्रेमिका डॉली की मदद से अपनी पत्नी प्रिया का क़त्ल किया है। प्रिया को मथुरा लाने का उद्देश्य उसको घुमाना नहीं बल्कि उसका क़त्ल करना था। मिकी ने दिल्ली से होटल गोवर्धन पैलेस में दो कमरे बुक कराये। गोवर्धन पैलेस इसलिए क्योंकि एक तो ये होटल लगभग ख़ाली रहता है और दूसरा ये पुलिस स्टेशन के नजदीक भी है। नजदीकी पुलिस स्टेशन होने की वजह से पुलिसिया कार्यवाही जल्दी होती और ये जल्दी फारिग हो जाता।एक कमरे में ये प्रिया के साथ ठहरा था व दूसरे कमरे में इसकी प्रेमिका डॉली। दोनों के लिए इसने एक जैसा सफ़ेद सूट ख़रीदा और शाम लगभग 5:30 से कुछ 10 मिनट पहले ही प्रिया की गर्दन तोड़ दी जो कि बतौर रेसलर इसके लिए मामूली बात थी। आगे की प्लानिंग के अनुसार इसने तुरंत डॉली को अपने कमरे में बुलाया और दोनों वहां से पति-पत्नी की तरह निकले। होटल के गेट पर पहुंचकर इन दोनों ने झगड़ने का नाटक शुरू कर दिया और कार तक पहुँचते-पहुँचते इनका नाटक अपनी चरमसीमा तक पहुँच गया। डॉली कार से उतरकर सीधा मिकी के कमरे में पहुँची लेकिन इस दौरान उसने पूरा ख्याल रखा था कि दुपटटा उसके चेहरे पर रहे ताकि कोई उसे पहचान न सके और मिकी अपनी कार में सवार होकर होटल से दूर चला गया। अब जो भी इन दोनों को देखता वो सीधा ही इस निष्कर्ष पर पहुँचता कि दोनों मियाँ बीबी आपस में झगड़ रहे हैं और झगडे के फलस्वरूप बीबी गाड़ी से उतरकर होटल लौट आयी है। इधर मिकी के कमरे में पहुंचकर डॉली ने अपने और प्रिया के सूट आपस में बदले और अपनी आमद के सारे निशान मिटाये फिर प्रिया की लाश को उठाया और खिड़की से नीचे फैंक दिया। प्रिया को नीचे फैंक कर डॉली सीधा अपने कमरे में पहुँच गयी। दरवाजे का बिल्ट इन लॉक खुद ब खुद लॉक हो गया जो इस बात की पुष्टि करता था कि  प्रिया के आने के बाद वहाँ कोई नहीं आया।  देखने में इनका प्लान बेहद सीधा लेकिन वाकई लाजबाब था। जो भी सोचता वो सीधा यही सोचता कि मियाँ बीबी का झगड़ा हुआ, बीबी लौट आयी। बेचारी डिप्रेशन में तो थी ही आत्महत्या कर बैठी। इनको अपने प्लान की कामयाबी पर इतना भरोसा था कि डॉली ने होटल में ही डेरा जमाये रखा। "

"लेकिन क़त्ल का कोई उद्देश्य भी तो होगा।"

"है न। दूसरी मोहब्बत। वैसे जैसा कि डॉली ने मुझे होटल में बताया था कि प्रिया और मिकी की अनबन रहने का कारण मिकी की लड़का पैदा होने की चाहत थी। इसी कारण प्रिया का इसने दो बार जबर्दस्ती अबॉर्शन कराया था जिसके कारण प्रिया डिप्रेशन में थी। इन दोनों के बीच डिप्रेशन की वजह से अनबन नहीं रहती थी बल्कि अनबन की वजह से डिप्रेशन था।"

"यानी मिकी एक नहीं बल्कि तीन कत्लों का गुनाहगार है।"

"तार्किक दृष्टिकोण से देखा जाए तो हाँ।"

"लेकिन सर एक बात बताइये, फोटो को देखते ही आप इस नतीजे पर कैसे पहुँच गए कि ये एक क़त्ल है?"

"भाई, दूसरी मंजिल से कूदकर की गयी ख़ुदकुशी तो वैसे ही मेरे गले नहीं उतर रही थी। लेकिन इनके पास इसके सिवाय कोई चारा भी नहीं था क्योंकि प्रिया को अकेले फंदे पर टाँग दे इतना दम डॉली में था ही नहीं। और जैसा कि मैंने तुमको बताया था कि मैं अपनी दूरबीन से इनको जाते हुए देख रहा था। तब जब डॉली उर्फ़ प्रिया कार से उतरकर दौड़कर होटल की तरफ आ रही थी तो बारिश की वजह से गीले सफ़ेद सूट में से मुझे उसकी नीली अंगिया की झलक दिखाई दी थी। लेकिन जब मैंने प्रिया की लाश की फोटो को ज़ूम किया तो देखा अंगिया लाल रंग की है। बस मैं तुरंत समझ गया कि क्या खेल रचा जा चुका है।"

"वाह सर! आपने तो इस केस को बहुत ही आसानी से हल कर दिया।"

"भाई, सही बताऊँ तो इस केस को हल करने में मेरा कोई खास योगदान नहीं है। ये तो बस इत्तेफ़ाक़न हल हुआ है। वैसे अगर मिकी का दुर्भाग्य इस केस के हल होने की मुख्य वजह बना।"

"आज भी मथुरा रुकोगे क्या सर?"

"नहीं भाई, आज तो अपने घर जाऊँगा। अभी शाम चार बजे की ट्रेन है जो मुझे मथुरा से सीधा हाथरस उतारेगी।"

"सर जब आपने मुझे पढ़ाया था तब भी मैं आपका कायल था और आज भी आपने मुझे अपना कायल बना लिया।"

"शुक्रिया श्रीकांत। खैर अब मुझे चलना चाहिए।" इतना कहकर मैं सीट से उठ खड़ा हुआ।

"सर मैं रेलवे स्टेशन तक आपको छुड़वाने का प्रबंध करता हूँ।" श्रीकांत ने तुरंत अपने ड्राइवर से गाड़ी लाने को कहा।

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Tuesday, 3 October 2017

#कलयुग।

हम हिन्दुओं के धर्मग्रंथों के अनुसार काल (समय) को चार भागों में विभाजित किया गया है जिनको कि युग कहा जाता है। ये चार युग है -- सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलयुग। इस समय कलयुग चल रहा है। वैसे तो हर युग में अनेकानेक घटनाएं हुई थी लेकिन मैं एक विशेष घटना के बारे में बताने जा रहा हूँ।

क्या आप जानते हैं कि हर युग में एक भीषण युद्ध हुआ है और उसने मानवता को एक खास हद तक प्रभावित किया है जैसे कि सतयुग में देवताओं और असुरों के बीच का संग्राम। क्या कहा कौनसा? लगता है आप भूल गए, अरे वही समुद्र मंथन वाला जो देवलोक और असुरलोक के बीच हुआ था, अमृत की वजह से।

त्रेतायुग में राम और रावण का युद्ध, जिसकी याद में अभी दो दिन पहले ही हम सबने एक त्यौहार मनाया है।

द्वापर युग में पांडवों और कौरवों मध्य हुआ युद्ध जिसे महाभारत भी कहा जाता है और जिसकी वजह से भारतवर्ष केवल भारत रह गया।

अगर आप गौर करेंगे तो पाएंगे कि सतयुग का युद्ध दो लोकों के बीच हुआ था, त्रेतायुग का युद्ध दो देशों के बीच लड़ा गया था और द्वापरयुग का युद्ध एक ही परिवार के दो वाशिंदों के मध्य लड़ा गया था।

आपने गौर कर लिया न? चलो अब मुद्दे की बात पर आते हैं। मुद्दे की बात ये है कि आप अगर नायक होकर दुश्मनों  पर नजर डालोगे तो पाओगे कि सतयुग में दुश्मन अलग लोक का था, त्रेतायुग में दुश्मन अलग देश का था, द्वापरयुग में दुश्मन परिवार का था। अब सोचो कि इस कलयुग में आपका दुश्मन कहाँ का है?

जनाब हर युग में दुश्मनी सिमटती जा रही है और कलयुग में आकर इतनी सिमट गयी है कि आप खुद अपने दुश्मन है। आप खुद अपने आप को नष्ट करते जा रहे हैं।

कलयुग में हर इंसान की दुश्मनी केवल खुद से है बादबाकी अगर आपको लगता है कोई आपका दुश्मन है तो आप जनाब बिल्कुल गलत हैं। आज किसी की किसी से कोई दुश्मनी नहीं है बस प्रतिस्पर्धा है और सामने वाला आपका दुश्मन नहीं वरन प्रतिद्वंदी है। आप किसी भी सापेक्ष में सोचने के लिए स्वतंत्र हैं और आपको पता ही होगा कि अपने प्रतिद्वंदी से जीतने के लिए आपको क्या करना है?  नहीं पता तो मैं बता देता हूँ-- आपको जीतोड़ मेहनत करनी पड़ेगी।

अच्छाई और बुराई सिमट कर हर इंसान में प्रवेश कर चुकी है, और जनाब आप यकीन मानिए कि इस कलयुग में हर इंसान अंदर ही अंदर खुद से लड़ रहा है। इंसान के अंदर की अच्छाई उसके अंदर की बुराई से लड़ रही है और उस इंसान के अंदर की बुराई उसके अंदर मौजूद अच्छाई से लड़ रही है। ये लड़ाई Evil vs Good है और इंसान इसमें पिस रहा है क्योंकि वो केवल खुद की Evil Vs Good से लड़ना नहीं जानता। कलयुग में हर इंसान बुरा है और हर इंसान अच्छा है लेकिन उसके अंदर का मौजूद दुश्मन न तो उसे उसकी अच्छाइयों का अहसास दिला पाता और न उसकी बुराइयों का। इस दुश्मन का नाम है अहंकार।

ऐसी स्थिति में कुछ बाहरी मदद की जरुरत होती है जो कि आप जैसे गुणज्ञानी ही कर सकते हैं।

बस आपसे यही एक गुजारिश है कि अपने अंदर की बुराई पर काबू करकर किसी दूसरे इंसान के अंदर की बुराई को भी दूर करने का प्रयत्न करो। बात आपकी या मेरी नहीं है जी, बात बस उस नयी पीढ़ी की है जिसे हमको संभालना है और पालना है ताकि वो आगे आने वाली पीढ़ी को पाल सके और हमारे और आपके जिन्दा रहते हुए मानवता बची रहे, ताकि वो अपनी जिंदगी और दूसरे की मौत का अंतर समझ सकें, ताकि लॉस वेगास जैसी घटना फिर न घट सके।

पुनश्चहः- अगर आपकी किसी से लड़ाई चल रही है तो उसे भूल जाओ और खुद से लड़ाई लड़ो क्योंकि आपके सबसे बड़े दुश्मन आप खुद हो। मैं भी खुद का सबसे बड़ा दुश्मन हूँ।

शुभरात्रि।

Friday, 29 September 2017

#इश्क़

इश्किया फिल्म तो देखी होगी! अरे वही नसिरुद्दीनशाह, अरशद वारसी और विद्या बालन वाली, 'दिल तो बच्चा है जी' वाली। नहीं देखी तो इसका नाम तो सुना ही होगा। कुछ समय पहले इसका सीक्वल भी आया था - 'डेढ़ इश्किया'। अगर आपको ध्यान हो तो डेढ़ इश्किया के पहले टीजर-ट्रेलर में नसीरुद्दीन साहब बिल्कुल ही नया कॉन्सेप्ट लेकर हाज़िर हुए थे और इसी कॉन्सेप्ट का नतीजा था कि फिल्म ने बरबस ही लोगों का ध्यान खींचा था और अच्छा खासा बिज़नस किया था। ये कॉन्सेप्ट फिल्म की यूएसपी बना था क्योंकि आमजन इससे लगभग अछूता रहा था।

आमजन इश्क़ को तो जानता था लेकिन जब इस फ़िल्म के टीजर में नसीर साहब ने बताया कि इश्क़ के सात मुकाम होते हैं तो हरेक दिमाग में एक कौतूहल चल निकला कि "इश्क़ के सात मुकाम?"

नसीर साहब ने टीजर में बताया था कि इश्क़ के सात मुकाम होते हैं जो कि क्रमशः इस प्रकार हैं। दिलकशी (हब), उन्स, इश्क़, अक़ीदत, इबादत, जुनून, और मौत। जी हाँ जनाब, अरबी साहित्य (जो आजकल उर्दू में भी सम्मिलित है) के अनुसार इश्क़ के वाकई सात स्तर होते हैं और वो मैंने ऊपर लिख रखे हैं। उस समय मैंने भी ये सातों स्तर पहली बार सुने थे और सब लोगों की तरह।

अगर आप सोच रहे हों कि मैं ये पोस्ट इश्किया, डेढ़ इश्किया या नसीर साहब की तारीफ में लिख रहा हूँ तो जनाब आप बिल्कुल गलत हैं । मैं ये पोस्ट गुलजार साहब की तारीफ़ में लिख रहा हूँ जिन्होंने इश्क़ के इन सात चरणों को बेहद खूबसूरती से एक गीत में लयबद्ध किया है। अगर आप व्यस्त हैं तो इस पोस्ट को सेव या बुकमार्क कर लें। क्योंकि बात इश्क़ की है तो लंबी होनी स्वाभाविक है।

सन 1998 में एक फिल्म आयी थी 'दिल से'। फिल्म उस ज़माने में कोई ढंग का व्यापार नहीं कर पायी लेकिन इस फिल्म के गानों और संगीत ने उस ज़माने में खासा मुकाम हासिल किया था और आज तक इस फिल्म को इसके संगीत के लिए जाना जाता है । इस फिल्म में संगीत 'अल्ला रक्खा रहमान' साहब (A R Rahman) ने दिया था।


इस फिल्म का एक गाना 'सतरंगी रे', जो कि गुलजार साहब द्वारा लिखा गया था, में इश्क़ के उपरोक्त सातों स्तरों की क्रमबद्ध व्याख्या दी गयी है।



गाना शुरू होता है-- "तू ही तू…. तू ही तू सतरंगी रे.........कोई ख़्वाब हैं या परछाई है, सतरंगी रे ? सतरंगी रे…..
इस बार बता मुजोर हवा ठहरेगी कहाँ?" ये पहला स्तर है, यानि की हब, मतलब आकर्षण। ये वही चीज है जिसे पहली नजर का प्यार कहा जाता है। यहाँ उसकी तारीफ़ की जाती है, उसके बारे में सबको बताया जाता है। उसकी हर अदा मन को भाने लगती है। इस मुखड़े के साथ ग़ालिब का एक शेर भी चलता रहता है जिसका तात्पर्य है कि इश्क़ होने का कोई कारण नहीं होता, बस हो जाता है यूँ ही।

“आँखों ने कुछ ऐसे छुआ, हल्का हल्का उन्स हुआ,
हल्का हल्का उन्स हुआ, दिल को महसूस हुआ।"
गाने के इस हिस्से पर पहुँचते ही आपको “उन्स” शब्द ही सुनाई दे जायेगा। उन्स का मतलब होता है आसक्ति। ये वो स्तर है जहाँ उसको देखभर लेने की ख्वाहिश, उसको केवल छू भर लेने की ख्वाहिश जोर मारने लगती है। किसी खास गली के चक्कर लगने शुरू हो जाते हैं। किसी खास जगह, एक खास समय पर आप खड़े रहना शुरु कर देते हो। अंग्रेजी में इसे infatuation कहा जाता है। यहाँ तक जो होता है वो अच्छा होता है और उसमें मज़ा भी आता है। लेकिन फिर शुरू होता है तीसरा स्तर...

"तेरी जिस्म की आंच को छूते ही, मेरे सांस सुलगने लगते हैं,
मुझे इश्क़ दिलासे देता हैं, मेरे दर्द बिलखने लगते हैं"
तीसरा स्तर है "इश्क़" यानि वो जिसे हम आम तौर पर प्यार भी कहते हैं। यहाँ से दर्द शुरू होते हैं। सारे कष्ट यहीं आते हैं, यहीं दिल टूटता है, उसके द्वारा किसी को देखभर लेने से जलन भी यहीं महसूस होती है, आँखों से आँसू भी इश्क़ के इसी मुकाम पर आकर निकलते हैं। यहीं आशिक़ और माशूक़ का तमगा मिलता है और अधिकतर इश्क इस मुकाम पर आकर दम तोड़ देते हैं। इसके बाद....

"छूती है मुझे सरगोशी से, आँखों में घुली खामोशी से,
मैं फर्श पे सजदे करता हूँ, कुछ होश में कुछ बेहोशी से।" इस अंतरा में आपको इश्क़ का चौथा और पांचवा स्तर मिलेगा। यहाँ इश्क़ कुछ-कुछ श्रद्धा (अक़ीदत) जैसा और कुछ कुछ इबादत (भक्ति) जैसा हो जाता है। इस स्थिति में आपको उसकी कही हर बात में सच्चाई नज़र आने लगेगी, उसके द्वारा किया गया हर कार्य सही नज़र आने लगेगा। यहाँ आकर आपका प्यार भगवान जैसा हो जाता है 'पवित्र' । इस से आगे बढ़ने पर इश्क़ पागलपन जैसा हो जाता है और इश्क़ का छटवां स्तर शुरू हो जाता है।

"तेरी राहों में उलझा उलझा हूँ, तेरी बाहों में उलझा उलझा,
सुलझाने दे होश मुझे, तेरी चाहों में उलझा हूँ,
मेरा जीना जूनून, मेरा मरना जूनून,
अब इसके सिवा नहीं कोई सुकून"। ये इश्क़ का छटवां स्तर है जिसे "जूनून" कहते हैं। इश्क़ के इस मुकाम पर आकर व्यक्ति उलझ जाता है और सुलझने की लाख कोशिशों के बावजूद भी वो उलझा ही रहता है। यहाँ इश्क़ अब इश्क़ नहीं रहता वो एक पागलपन में तब्दील हो जाता है और समाज के लिए घातक हो जाता है। यहाँ तक आशिक और माशूक़ एक दूसरे के बारे में इतना सोच चुके होते हैं कि और कुछ सोचने के क़ाबिल नहीं रह जाते। यहाँ अलगाव की सोचना भी नारकीय दुःख जैसा होता है और खुद बखुद एक गंभीर कदम उठ जाता है। एक स्थितप्रज्ञ जैसी मनोदशा हो जाती है। फिर शुरू होता है सातवाँ स्तर...

"मुझे मौत की गोद में सोने दे,
तेरी रूह में जिस्म डुबोने दे"। ये इश्क़ का अंतिम स्तर है जिसे आप अंत कह सकते हैं या जिसे आप एक शुरुआत भी कह सकते हो। क्योंकि यहीं से इश्क़ के किस्से मशहूर होना शुरू होते हैं। यहीं से दुनिया राधा-कृष्ण, लैला-मजनू, हीर-राँझा, सोहनी-महिवाल से परिचित होती है। उर्दू में इसे 'इश्क़ में रूह फ़ना होना' कहते हैं।

तो जनाब ये थे इश्क़ के सात मुकाम जिनको गुलजार साहब ने बहुत खूबसूरती से 7 मिनट के गीत के माध्यम से समझा दिया था। बादबाकी, जरूरी नहीं है कि इश्क़ केवल व्यक्तिपरक ही हो। इश्क़ कई प्रकार का होता है जैसे कि ईशपरक-- इसके अंतिम चरण को कैवल्य कहा जाता है और भक्त (संत) लोग इसके लिए समाधि का सहारा लेते हैं। एक अलग तरीके का इश्क़ भी होता है जो कि बाज लोग ही फरमा पाते हैं और इन बाज लोगों की माशूक़ होती है सफलता। लेकिन जनाब इस किस्म के इश्क़ के केवल छः ही स्तर होते हैं मतलब जूनून तक। इस इश्क़ की चर्चा फिर कभी करेंगे। दुर्गानवमी एवं विजयादशमी की शुभकामनाओं सहित।

शुभरात्रि।

(विशेष आभार पंकज सर का, विद्यालय वाले नहीं।)







Thursday, 21 September 2017

#जिन्दाहूँ।

कहते हैं हमारा जन्म होना निश्चित नहीं है लेकिन अगर जन्म हुआ है तो मृत्यु होनी सुनिश्चित है। पृथ्वी पर मौजूद हर प्राणी का जन्म हुआ है और जन्म लेना खुद उसके बस की बात नहीं थी, ये जो जन्म हमको मिला है इसके निमित्त हम नहीं है। हमारे या किसी भी प्राणी के जन्म का निमित्त प्रकृति द्वारा बनाये गए नियम होते हैं और इन्हीं नियमों के हिसाब से हर प्रजाति के बच्चे को उसके पैदा होते ही तीन प्रवृत्तियाँ उपहार स्वरूप मिलती हैं; पहली- : जिजीविषा मतलब जीने की इच्छा। दूसरी-: भूख मतलब जीने की वजह। तीसरी-: डीएनए मतलब अपने अस्तित्व और ज्ञान को स्थानांतरित करने के लिए आगामी पीढ़ी का निर्माण करना।

खैर क्या आपने कभी सोचा है कि अगर आप इस धरती पर मौजूद हैं, जिन्दा हैं, खुश हैं तो इसके लिए आपके पिताजी और माताजी ने अपने जीवन में कितना संघर्ष किया है?

और आपके माताजी और पिताजी के पिताजी ने उनको जिन्दा रखने के लिए कितना संघर्ष किया होगा?

और आपके दादाजी और नानाजी के पिताजी ने उनको जिन्दा रखने के लिए कितना संघर्ष किया होगा। उस ज़माने में तो शायद इतनी बिजली भी मयस्सर नहीं थी।

इसी श्रृंखला को अगर और पीछे तक ले जाएं तो आपके पूर्वज जो अचानक कहीं बंदरों के झुण्ड से अलग होकर होमोसेपियंस बने; कभी सोचा है उन्होंने जिन्दा रहने के लिए कितनी मशक्कत की होगी। अगर उनमें से किसी एक भी मृत्यु हुई होती तो शायद आज 10 करोड़ से ज्यादा लोग इस धरती पर मौजूद नहीं होते। उन लोगों ने अपनी भूख मिटाने के कई तरीके जुटाते हुए अपने डीएनए और ज्ञान को पीढ़ियों दर पीढ़ी ट्रांसफर किया और खुद को अपनी प्राकृतिक मृत्यु तक जीवित रखा।

वो लोग जिन्दा रहने की कीमत जानते थे तभी तो आज आपका अस्तित्व है। उन्होंने अपना अस्तित्व कायम रखने को बेहद संघर्ष किया था। घने जंगलों में जंगली जीवों से बचने के तरीके ईजाद किये थे, अपनी भूख मिटाने के लिए भोजन के तमाम विकल्प तलाश किये थे। कढ़ी ठण्ड में जिन्दा रहने के लिए जरूरी आग को तलाश किया था। लंबी दूरी तक जाने के लिए पहिये का अविष्कार किया था। जंगली जानवरों से बचाव और उनका शिकार करने के लिए हथियारों का अविष्कार किया था।

अच्छा कल्पना करो कि आपके पूर्वजों में से कोई अगर अपनी जिंदगी से हार जाता और किसी जंगली जानवर के सामने समर्पण कर देता तो क्या होता? जनाब कई जातियाँ नहीं होती, कई धर्म नहीं होते।

उनके इतने संघर्ष से शायद आजकल की पीढ़ी ने कुछ नहीं सीखा? हमने सीखा तो बस इतना कि जो हो हमारी मर्जी के अनुसार हो, हमारी पसंद के अनुसार हो, हमारी क्षमता के अनुसार हो, मतलब सारी परिस्थतियां हमारे अनुकूल हों। जनाब अगर हमारे पूर्वज कई हज़ार साल पहले ऐसा चाहते तो आज हम जिस दुनिया में हैं वो ऐसी नहीं होती बल्कि वैसी ही होती जैसी कई हज़ार साल पहले थी। हमारे पूर्वजों ने परिस्थितियों का डटकर मुकाबला किया था और उनको बदलने की ठानी थी तभी तो आज हम पृथ्वी की सबसे सर्वश्रेष्ठ प्रजाति हैं।

जैसा कि मैंने शुरुआत में कहा था कि हमारा जन्म अनिश्चित है, मतलब हमारा जन्म हमारे हाथ में नहीं है और मृत्यु तो प्रकृति प्रद्दत है लेकिन कुछ कमजोर मनुष्यों ने इस मृत्यु को मुश्किलों, आफतों, परिस्थितियों और मेहनत से बचने के लिए अपने हाथ में ले लिया है।

संसार में जीवित समस्त प्रजातियों में शायद इंसान ही एक ऐसा प्राणी है जो खुद को मार सकता है क्योंकि जानवरों को न जन्म की समझ और न मृत्यु की। वो बस उन तीन प्रवृतियों का निर्वहन कर रहे हैं जिनका मैंने शुरू में जिक्र किया था।

आखिर खुद को मारने वाले ये इंसान कौन हैं? यही प्रश्न रूस के एक 21 साल के लड़के के दिमाग में आया और उसने उन खुद मरने के लिए तैयार लोगों को नया नाम दिया 'बायोलॉजिकल वेस्ट' और उनके जीवन के अंत के लिए एक प्लेटफार्म उपलब्ध कराया और उसको नाम दिया "ब्लू व्हेल"। इस नाम के पीछे भी एक लॉजिक है।

आखिर क्या है ये ब्लू व्हेल? कैसे काम करता है ये? क्यों केवल बच्चों को शिकार बनाता है ये गेम? क्यों आपको इसका लिंक नहीं मिला कहीं?

आखिर क्या बला है ये? कैसा गेम है? कहाँ पाया जाता है? क्यों आपको इतने ढूंढने से नहीं मिल पा रहा है और क्यों इसे खेलने वाला अंततः अपनी जान से हाथ धो बैठता है? आइये जानते हैं।

सबसे पहले अगर इस गेम के नामकरण की बात की जाये तो इस गेम के नामकरण के पीछे केवल एक तथ्य है कि हम इंसानों के बाद 'ब्लू व्हेल' ही है जिसमें कुछ जीवविज्ञानियों के अनुसार आत्महत्या करने की प्रवृत्ति पायी जाती है। वो अक्सर गहरे समुद्र से किनारे पर आ जाती है और डिहाइड्रेशन अथवा ब्लो होल के अवरुद्ध होने के कारण दम तोड़ देती है। भले ही उनके किनारे पर आने का कारण कुछ भी रहा हो, चाहे शक्तिशाली समुद्री लहरों द्वारा उत्पन्न दुर्घटना रही हो परंतु कुछ जीवविज्ञानी इसे आत्महत्या की श्रेणी में रखते हैं और इसी तथ्य के आधार पर इस गेम का नामकरण 'ब्लू व्हेल' हुआ।

कुछ लोग होते हैं जो कुछ अलग हटके ईज़ाद करते हैं और उनको अन्वेषक कहा जाता है परंतु कुछ लोग ऐसे होते हैं जो ज्यादा ही अलग सोच जाते हैं और कुछ ऐसा ईज़ाद कर देते हैं कि उनको अन्वेषक नहीं बल्कि साइकोपैथ कहा जाता है। आज से लगभग दो या तीन साल पहले ऐसे ही एक साइकोपैथ ने सोचा कि दुनिया में कुछ ऐसे भी लोग हैं जिनका जीना बेमानी है और उन लोगों को उसने नाम दिया 'बायोलॉजिकल वेस्ट' और समाज को उनसे मुक्त कराने के लिए उसने लगभग 19 साल की उम्र में बकायदा एक योजना तैयार की और उसका नाम रखा 'ब्लू व्हेल'।

'फिलिप बुदेंकीं' जी हाँ जनाब, यही नाम है उस साइकोपैथ का जो कि रूस का नागरिक है और फ़िलहाल कई बच्चों को आत्महत्या के लिए उकसाने के जुर्म में सजा काट रहा है और इस समय लगभग 22 साल का है। अगर सोचा जाये तो जितना दिमाग इसने इस गेम को ईज़ाद करने में लगाया अगर उतना दिमाग किसी और जगह लगाता तो समाज का कितना फायदा होता। खैर इसी को समाज कहते हैं जहाँ अलग अलग विचारधारा के लोग रहते हैं।

जैसा कि मैंने आपको अपनी पिछली पोस्ट, जो कि इसी शीर्षक से थी, में बताया था कि जिन्दा रहने की इच्छा यानि जिजीविषा हमको पैदा होते ही मिल जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस जिजीविषा को कायम रखने के लिए प्रकृति ने हम सबको एक और चीज मुहैया कराई है और वो है 'डर'। जी हाँ जनाब, अगर आप जिन्दा हैं और ये पोस्ट पढ़ पा रहे हैं तो यकीन मानिए आप डरे हुए हैं। ये डर ही है जो आपको, मुझको और हम सबको जिन्दा रखे हुए है। अच्छा एक काम कीजिये आप अपनी जिंदगी में से डर को निकाल दीजिये। निकाल दिया? बढ़िया है।

डर निकल चुका है समझे, अब सोचो आप सड़क पर बाइक या कार ड्राइव कर रहे हैं, चूँकि आपके अंदर डर है ही नहीं तो इसका मतलब आप गति की परवाह नहीं करेंगे, आप लेफ्ट हैण्ड ड्राइव की परवाह नहीं करेंगे। अगर आप पैदल हैं तो किसी भी गाड़ी के हॉर्न की इतनी औकात नहीं है जो आपको सामने से हटा सके। सड़क पर चलते हुए आप ट्रैफिक के नियमों को इसलिए मानते हैं क्योंकि आपको डर लगता है। आप ट्रक के बजते हॉर्न से नहीं बल्कि उससे कुचलने के परिणामस्वरूप होने वाली मौत की डर की वजह से उसे साइड देते हो और किनारे हो जाते हो।

ये केवल और केवल डर ही है जो आप बिजली के किसी भी काम को करते समय चप्पल पहन लेते हो। मसलन कूलर में पानी डालना हो, फ्यूज बदलना हो, mcb ऊपर या नीचे करनी हो, या कटिया डालनी हो।

ये केवल और केवल डर ही है जो आप रोज रात को बाहर गेट का ताला लगाकर भी दुबारा चैक करते हो। अँधेरी गलियों से गुजरने से कतराते हो। सांढ़ के सामने दीखते ही दायें बायें जगह तलाश करते हो।

ये केवल और केवल डर ही है जो आप कहीं काम कर पा रहे हैं, नहीं तो अपने बॉस को गाली देने का मन किसका नहीं करता?

खैर और भी कई उदाहरण हो सकते हैं। जिजीविषा हमें उपहार में मिली हुई है और जीवन रुपी इस उपहार को बचाने के लिए प्रकृति ने हमको 'डर' रुपी हथियार दिया। यही हथियार था जो हमारे पूर्वजों को जिन्दा रख पाया था।

अगर हमारे अंदर ये डर न होता तो हम मर गए होते। गब्बर सिंह गलत थे जो कह गए थे कि 'जो डर गया सो मर गया।' बल्कि सत्य इसका बिल्कुल उलट है 'जो नहीं डरा वो मर गया।'

तो जनाब यही सिद्धांत है इस गेम का-: मतलब अगर आपको ख़त्म करना है तो आपके अंदर का डर निकालना पड़ेगा। जैसे जैसे आपके अंदर का डर निकलता जायेगा आप खुदबख़ुद मरने के लिए तैयार होते जायेंगे वो भी बिना शिकायत किये।

ये कोई खेल नहीं है ये एक रास्ता है जिसमें पचास कदम हैं और मंजिल सिर्फ और सिर्फ मौत है।

आपके बच्चे इस मंजिल के सबसे नजदीकी और पसंदीदा शिकार हैं। न आपके बच्चे को पता चल पाएगा न आपको पता चल पाएगा कि कब वो मौत की गिरफ़्त में जकड़ा जा चुका है। अगर आप चाहते हैं कि आपका बच्चा इसके चंगुल में न आये तो अपना मोबाइल छोड़कर उसका मोबाइल उठा लो बस।

अपने बच्चे को बचाने के लिए सबसे पहले उसका मोबाइल लेकर उसके सारे सोशल मीडिया एकाउंट्स को खंगालें, खासकर उसकी चैट्स और उसके द्वारा ज्वाइन किये गए ग्रुप्स। अगर कुछ संदेह हो तो तुरंत उनको पीटें नहीं बल्कि बात करें वो भी प्यार से।

और अगर आप ये सोच रहे हों कि फिलिप तो गिरफ्तार हो चुका है तो मैं बस इतना कहना चाहूंगा कि उसके विचार और उसकी सोच खुल चुकी है और जगजाहिर है। हमारे देश में भी कई  आलादिमाग बेरोजगार नौजवान हैं जो क्या कर सकते हैं आपको नहीं मालूम।

पुनः - ये कोई खेल नहीं है, ये केवल मनोविज्ञान है जो आपके बच्चे को अपनी गिरफ्त में इस प्रकार लेगा कि वो केवल और केवल छत से कूदेगा। चाहे आप खुद कोई मनोवैज्ञानिक सही।

कैसे अपने उद्देश्य में सफल होता है इस गेम का एडमिनिस्ट्रेटर?

डिस्कवरी चैनल तो शायद आप देखते होंगे? अरे वही जिसमें कभी कभी जंगली जानवरों के ऊपर या कभी और किसी मुद्दे पर ज्ञानवर्धक डॉक्यूमेंट्रीज दिखाई जातीं है। आज एक डॉक्युमेंट्री मैं भी देख रहा था 'बिग कैट्स'। काफी ज्ञानवर्धक थी खासतौर पर शेरनियों द्वारा हिरनों के झुंड पर हमला बोलना और उनमें से एक हिरन मार कर खा लेना। इस डॉक्युमेंट्री को देखकर आज मुझे एक नयी जानकारी मिली। पहले मैं सोचता था कि शेर या अन्य जंगली जानवर जो शिकार करते होंगे वो तो बस यूँ ही कर लेते होंगे, मसलन 200 हिरणों के एक झुण्ड पर हमला बोल दिया और जो हाथ लग गया उसे मार कर खा लिया। लेकिन आज उस डॉक्युमेंट्री को देखकर मेरा ये पूर्वाग्रह दूर हो गया। ऐसा नहीं होता जनाब, शेरनियाँ सबसे पहले हिरणों के झुंड का अवलोकन करती हैं, फिर उसमें से सबसे कमजोर शिकार छांटा जाता है (कमजोर मसलन, शक्ति में कमजोर, झुण्ड से उसकी दूरी, शेरनियाँ से उसकी नजदीकी, किसी भी खतरे से बेपरवाह होने की उसकी लापरवाही आदि) और अंत में उसकी घेराबंदी करके उस पर हमला बोला जाता है और उसको उसके झुण्ड से दूर खदेड़ कर मार दिया जाता है, उसे खाकर थोड़ा आराम किया जाता है और इसके तुरंत बाद दूसरे शिकार की तलाश शुरू हो जाती है और ये क्रम चलता रहता है।

ठीक यही कार्यविधि ब्लू व्हेल गेम की है और यही कारण है कि आपको इसका लिंक नहीं मिला होगा। वैसे तो इसको भारत में प्रतिबंधित कर दिया गया है, परंतु ये कोई गेम नहीं है बल्कि ये एक सोच है जिसको कोई प्रतिबंधित नहीं कर सकता और ये एक चैलेंज है। आप इसे नहीं ढूंढ पाएँगे क्योंकि ये चैलेंज अपने शिकार खुद ढूँढता है। इसके शिकार आप और मुझ जैसे लोग नहीं हैं बल्कि अपने जीवन से बेजार बच्चे हैं। एक और बात कि इस कसौटी पर खरा उतर सकने वाले दुनिया के आधे प्रतिशत से भी कम बच्चों तक इसकी पहुँच हैं क्योंकि इस चैलेंज के एडमिन अपने शिकार सोशल मीडिया पर बने कुछ खास ग्रुप्स में ढूंढते हैं।  (अगर आप वयस्क हैं और मेरे छात्र या छात्रा नहीं हैं तो इन ग्रुप्स के बारे में आपको जानकारी मिल सकती है।) अगर आपको इसका कहीं लिंक मिल भी जाता है तो मेरा विश्वाश मानिये कि वो फर्जी लिंक होगा और हो सकता है कि कोई मालवेयर हो क्योंकि इसका लिंक भारत में तो आपको मिलने से रहा। मैंने खुद लगातार दो घंटे सर्च किया और परिणाम मिला 'घंटा' क्योंकि इस गेम का लिंक आम नहीं है। ये गेम चूँकि एडमिन आधारित है, मतलब हरेक शिकार के लिए एक एडमिन का होना जरूरी है इसलिए जगजाहिर लिंक पर अगर दस हजार शिकार (मामूली नंबर है ) भी इस चैलेंज को स्वीकार करें और एक एडमिन एक दिन में 50 शिकारों को हैंडल करे तो लगातार 50 दिन तक 200 एडमिन चाहिए होंगे जिनको कि कोई आमदनी भी मुहैया नहीं है।  इसलिए इसका लिंक पब्लिक होना असंभव है। आप सोच रहे होंगे कि बिना आमदनी फिर इस चैलेंज को क्यों इतना फैलाया गया तो इसके जवाब में केवल एक शब्द है 'ठरक' ,मतलब सनक।

इसका लिंक सोशल मीडिया पर मौजूद कुछ दुर्लभ ग्रुप्स में मौजूद है जिनका कि आपने कभी नाम भी न सुना होगा और न कभी कल्पना की होगी कि ऐसे भी ग्रुप मौजूद हैं। इन ग्रुप्स के एडमिन आप और हम जैसे लोगों को कभी इन ग्रुप्स में शामिल नहीं करेंगे। इसलिए इन ग्रुप्स को भूल जाओ।

इस चैलेंज का एडमिन अपने शिकार को इन ग्रुप्स में से कई दिन की वॉच के बाद चुनता है और फिर शुरू होता है उसके अंदर से डर निकालने का सिलसिला। जिसके लिए 49 स्टेप्स हैं मतलब टास्क। डर निकालने के लिए सबसे पहले ये अपने शिकार की नींद कम कराते हैं और उसे रात को असामान्य समय पर उठने के लिए कहते हैं और बतौर सबूत उसी समय एक मैसेज और घर पर मौजूद तीन घड़ियों का फोटो भेजना पड़ता है।

आगे के स्टेप्स में, शिकार को रेल की पटरियों पर जाना, अपने शरीर पर कट लगाना, पूरी रात उनके द्वारा बताई गयी  हॉरर मूवी देखना, अपने हाथ पर ब्लेड से कोई नम्बर लिखना, किसी ऊँची इमारत से सड़क की तरफ पैर लटका कर बैठना आदि।

ये सारे स्टेप्स जगजाहिर हैं और शायद 15 या 20 तक होंगे। लेकिन असली कहानी इसके बाद शुरू होती है। यहाँ से जो एडमिन होता है वो खुदको व्हेल कहता है और अगले स्टेप में उससे स्काइप कॉल करनी होती है। उस कॉल में व्हेल उसको एक म्यूजिक फाइल भेजता है जिसको लगातार आठ या दस घंटे सुनना होता है। सारा काम इस म्यूजिक का होता है जो इन व्हेल्स द्वारा कंपोज्ड होता है और शिकार को (जिसके अंदर से डर निकल चुका है) लगभग सम्मोहित कर लेता है। अगले टास्कस में शामिल है; एडमिन द्वारा भेजा गया म्यूजिक सुनना, किसी भी शख्श से बात न करना, अपने हाथ पर ब्लेड से एक खास पैटर्न पर कट बनाना। कब्रिस्तान और शमशान जाना।
फिर से व्हेल से बात करना, म्यूजिक सुनना, और आखिर में छत से कूद जाना।

अगर आप इसे मजाक समझ रहे हैं तो गलती कर रहे हैं क्योंकि आपके अंदर आत्मघाती प्रवृत्ति नहीं है। लेकिन यदि सोचा जाये तो अगर किसी बच्चे की कुछ इच्छा पूरी न हुयी हो तो?

 मैं आजकल के बच्चों की साइकोलॉजी से इसलिए परिचित हूँ क्योंकि हर साल मेरे नसीब में लगभग एक हज़ार बच्चे आते हैं वो भी तमाम किस्म के। आप शायद अपने बच्चे को इतना नहीं जानते होंगे क्योंकि आपके पास समय नहीं होगा? आपको टीवी सीरियल देखने हैं, आपको फेसबुक पर काफी लाइक्स देने है ताकि आपकी पोस्ट पर लाइक्स आ जायें, आपको व्हाट्सएप पर आये हुए सारे फोटो और वीडियो देखने हैं, आपको वो सारे काम करने हैं जिनको करके आपका कुछ भला नहीं होने वाला।

लेकिन आप अपने बच्चों को नहीं देख सकते क्योंकि आपने अपने कर्तव्य की इतिश्री इसलिए कर ली है कि आपका बच्चा किसी इंटरनेशनल स्कूल में है और उसका ट्यूशन भी आपने लगाया हुआ है। जनाब फिर कह रहा हूँ, अपने बच्चे का फोन लो और चेक करो कि किससे चैट कर रहा है और कौन से ग्रुप का मेम्बर है? खतरा और दुर्घटना कभी बताकर नहीं आती। अपने बच्चे की हरकतों को नोटिस करो और अगर कुछ असामान्य सा लगे तो तुरंत उससे प्यार से बात करो। आपका बच्चा यक़ीनन किसी न किसी प्रभाव में जरूर होगा।

आखिर में, आप इंटरनेट को इतना नहीं जानते जितना कि आपके बच्चे जानते हैं। फैसला आपको खुद करना है आप अपने मोबाइल को ज्यादा चाहते हैं या अपने बच्चे के मोबाइल को, क्योंकि आपके बच्चे के बाद उसका मोबाइल आपके पास ही रहेगा।

ये चैलेंज एक 19 साल के लड़के के द्वारा फैलाया गया है और आप शायद नहीं जानते कि आज कल की युवा पीढ़ी अगर अपनी सामर्थ्य और दिमाग का प्रयोग करे तो वो पल भर में विकास को विध्वंस में और विध्वंस को विकास में परिवर्तित करने का माद्दा रखती है।

मुझको यहाँ तक झेलने के लिए शुक्रिया। तीनों पार्ट्स का सम्मिलित संस्करण पहले कमेन्ट में मिल जायेगा।

शुक्र है कि मैं और आप जिन्दा हैं।

शुभ रात्रि।





Tuesday, 19 September 2017

#लाइब्रेरी

वो आज फिर वहीँ खड़ा था, पहले वो भले ही वहाँ अकेला आता रहा हो किंतु आज उसके साथ उसका 10 बरस का बेटा भी था। निगाहों पर मोटे लेंसों का चश्मा लगाये, सफ़ेद कमीज और काली पतलून पहने हुए वो करीब चालीस साल का लग रहा था जो कि उसकी वास्तविक उम्र नहीं थी। समय की मार उसकी जवानी को जबरन बुढ़ापे में तब्दील किये जा रही थी। पेशे से वो कंप्यूटर हार्डवेयर इंजीनियर था लेकिन हाल फिलहाल रूपये-पैसे के मामले में उसका हाथ तंग था। उसने अपनी झाइयों भरी सूनी आँखों से ऊपर लगे बोर्ड पर निगाह डाली जिस पर लिखा हुआ था 'बोस पुस्तकालय' और उसी बोर्ड के नीचे एक और बोर्ड 'बिकाऊ! इच्छित व्यक्ति संपर्क करें' लगा हुआ था। नीचे वाले बोर्ड को देखकर उसने अपना मुँह बनाया और वो पुरानी यादों में खो गया।

वो भी दस साल का था जब पहली बार उसके पिताजी उसे इस लाइब्रेरी में फुसलाकर लेकर आये थे।  उन्होंने कहा था कि वो उसे ज्ञान का खजाना दिखाने ले जा रहे हैं और वो मासूम उनकी बातों में आकर वहां चला आया था। वो मन ही मन सोचने लगा न जाने कैसी जगह है जहाँ बच्चे, बड़े, बूढ़े मिलाकर लगभग 50 से ज्यादा लोग मौजूद हैं लेकिन फिर भी इतनी शांति है और वो लोग बिना एक दूसरे से बातें करते हुये केवल और केवल अख़बारों, पत्रिकाओं और मोटी-मोटी किताबों को पढ़ रहे हैं। अपने पिताजी की देखादेखी उसने भी एक रंग-बिरंगे चित्रों से सुसज्जित एक पतली सी किताब उठाई जिसके बारे में उसके पिताजी ने बताया कि ये कॉमिक्स होती है। अगले 2 घंटे उसके पिताजी अख़बारों से जूझते रहे और वो कॉमिक्सों से । वो इस बात से कतई बेख़बर था कि ये दो घण्टे उसके जीवन को बदलने वाले थे। उस दिन उसे पढ़ने का ऐसा चस्का लगा कि उस लाइब्रेरी में उसकी हाज़िरी रोज की बात बन गयी। दोपहर को विद्यालय से लौटकर वो हर शाम के दो घंटे लाइब्रेरी में बिताता था। गर्मियों की छुट्टियों में वो अपना पूरा दिन वहीँ बिताता था। जैसे-जैसे वो बड़ा होता गया पढ़ने का उसका शौक भी बदलता गया। कॉमिक्स से शुरू करके वो जासूसी उपन्यास, सामाजिक उपन्यास, हिंदी साहित्य, धार्मिक साहित्य की वहां उपलब्ध सारी किताबें पढ़ चुका था। वो वहां का सम्मानित सदस्य था और उसको उस लाइब्रेरी की हर किताब की स्थिति की पूरी जानकारी थी। पढाई और नौकरी की खातिर जब उसने शहर छोड़ा था तो इतना दुःख उसे अपना घरबार छूटने से नहीं हो रहा था जितना कि लाइब्रेरी छूटने से। अपने पढ़ने के शौक के बारे में पूछने पर वो जवाब देता था कि यही किताबें उसकी ऱोजी रोटी का जरिया बनेंगी। गाहे-बगाहे जब कभी वो अपने कस्बे में आता तो लाइब्रेरी जरूर जाता और वहां की स्थिति को देखकर चिंतित हो उठता।

पढ़ने वाले कम होते जा रहे थे जिससे लाइब्रेरी का खर्च भी नहीं निकल पा रहा था, ऐसी कई जानकारियों की खबर उसे वहां के उसी मुलाजिम से मिली जिसको वो लगातार वर्षों से लाइब्रेरी की डेस्क के पीछे देखता आ रहा था। दस साल पहले जब वो वहाँ आया था तो केवल वही वहां का इकलौता पाठक था, इन्टरनेट और केबल टीवी के आगमन से लाइब्रेरी अब केवल 30" X 10" का एक कमरा भर रह गयी थी। उसके बाद के चक्कर पर उसे लाइब्रेरी में ताला लटका हुआ मिला और सबसे आखिरी के फेरे में दरवाजे पर लटका 'बिकाऊ' का बोर्ड दिखाई दिया जिससे उसका मन खिन्न हो उठा।

"पापा!" उसके बेटे की पुकार से उसका मन वापस वर्तमान में लौटा।

"मुझे खजाना दिखाओ न!" अपने बेटे की आवाज सुनकर वो थोड़ा मुस्कुराया और अपनी जेब से चाबी का एक गुच्छा निकाल कर उसने फट से लाइब्रेरी का ताला खोल दिया। अंदर की धूल देखकर उसके चेहरे पर थोड़े असंतोष के भाव आये और अपने बेटे को बाहर छोड़कर वो अंदर गया और करीब 20 मिनट बाद धूल और मकड़ी के जालों से लिपटा हुआ बाहर आया। बाहर आकर सबसे पहले उसने अपने कपड़ो को झाड़ा और अपने बेटे को लेकर अंदर पहुँचा। किताबें आज भी उन्हीं लोहे और लकड़ी की अलमारियों में उसी प्रकार सजी हुई थी जैसे कि उसके बचपन में सजी रहती थीं। दीमक और चूहों ने भी ज्ञान के खजाने को सम्मान बख्शा था। उसका बेटा कभी उसे और कभी किताबों को देखता। उसने अपने पापा को इतना प्रसन्न कभी नहीं देखा था।
"पापा आप तो कह रहे थे कि यहाँ खजाना छुपा हुआ है, लेकिन यहाँ तो बस किताबें ही किताबें है। खजाना कहाँ है?" उसके बेटे ने मासूमियत से पूछा।

जवाब में उसने एक अलमारी की तरफ इशारा कर दिया जिसमें इंद्रजाल के अलावा और भी कई पुरानी कॉमिक्सें थीं।

लड़के ने जब उस अलमारी पर निगाह डाली तो उसने गुस्से से पूछा, "मतलब आपने केवल इन किताबों को खरीदने के लिए अपना प्लॉट बेचा।"

वो मुस्कुराया और अपने बेटे को लाइब्रेरी के अंदर बने एक और कमरे में ले गया और अपने पास मौजूद चाबियों से एक अलमारी खोल दी जिसके अंदर बहुत पुरानी पांडुलिपियां मौजूद थीं। "ये आया खजाना!" वो गर्व से बोला।

"इन कागजों को खरीदने के लिए आप इतने दिनों से मम्मी को रुला रहे थे।" लड़के के स्वर में नफरत का पुट था।

"तुम नहीं समझ पाओगे और न ही तुम्हारी मम्मी। उस सौ गज के प्लॉट में बहुत छोटा सा मकान बनता। लेकिन मैं तुम्हारे लिए बड़ा मकान बनवाना चाहता हूँ एक कार भी खरीदना चाहता हूँ। खैर अभी मुझे परेशान मत करो।" इतना कहकर उसने अपना फोन निकाला और एक नम्बर पंच किया। दूसरी तरफ फोन उठते ही उसने अपना परिचय दिया और कहा, "बहुत कर ली आपकी गुलामी अब और नहीं करनी। मैं नौकरी छोड़ रहा हूँ और मेरी कल तक की तनख्वाह मेरे अकाउंट में पहुँचा देना।" उसने दूसरी तरफ से बोले जाने वाले शब्दों को सुनने से पहले ही फोन काट दिया।

उसने एक दूसरा नंबर मिलाया और अपना परिचय देकर बोला, "सर अब ड्राफ्ट बना दीजिये, रुपया मेरे अकाउंट से ट्रांसफर कर देना। फॉर्म आपको दे ही आया था। ...हाँ 25 लाख का बनेगा। पर्ची पर सब लिख छोड़ा है मैंने और जानकारी वहाँ से ले लेना।" इतना कहकर उसने फोन काट दिया।

उसने तुरंत ही फोन से एक और कॉल की और कहा, "आपका ड्राफ्ट तैयार हो रहा है, शाम को ड्राफ्ट की फोटो भेज दूंगा और मैं कल ड्राफ्ट आपको सौंप दूंगा और आपसे लाइब्रेरी के कागज ले लूँगा। डील डन।"

उसने वहीँ खड़े-खड़े आखिरी कॉल की और कहा, "सौदा हो चुका है, अब दो दिन में मेरी वेबसाइट बना दो। डिटेल्स मैं तुमको मौखिक बता चुका हूँ अगर कोई शंशय हो तो अपना ई-मेल चेक करना मैंने कल ही तुमको अटैचमेंट भेजा है। ठीक है!"

उसने एक चमक भरी निगाह उस लाइब्रेरी पर डाली और अपने बेटे के साथ बाहर निकल कर लाइब्रेरी का ताला बंद किया और 'बिकाऊ' वाला बोर्ड वहां से उतारकर फैंक दिया। घर लौटते समय उसका बेटा ये सोचकर हलकान हो रहा था कि उसके पिताजी ने इन किताबों के चक्कर में अपनी नौकरी छोड़ दी और प्लॉट भी बेच दिया।
जबकि वो सोच रहा था कि कैसे उसने इस एक साल में ऑनलाइन नीलामी वेबसाइट्स पर ऊंची ऊंची बोली लगाकर इंद्रजाल कॉमिक्स की एक प्रति की कीमत कम से कम 10,000 और ज्यादा से ज्यादा 50,000 करवा दी, एक मूल पाण्डुलिपि की कीमत भी 1,00,000 से क्या कम मिलेगी। उसे खूब ध्यान था कि लाइब्रेरी में हिंदी और अंग्रेजी की मिलाकर इंद्रजाल की करीब 400 कॉमिक्स व 200 के करीब उपन्यासों की मूल पांडुलिपियां थीं इनके अलावा लाइब्रेरी में कुछ दुर्लभ उपन्यासों और दुर्लभ पत्रिकाओं का भी तो संग्रह मौजूद है। ये सारी किताबें अब उसकी वेबसाइट पर नीलाम होंगी और शायद अब उसे किसी की नौकरी नहीं करनी पड़ेगी। उसे अपने पिताजी के कहे शब्द याद आ रहे थे "किताबें ज्ञान का खजाना होती हैं।" लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर आकर उसने शब्दों को अपने अनुसार बदल लिया था कि "किताबें खजाना होती हैं।" उसके अनुसार 25 लाख भले ही एक झटके में खर्च हो गए हों लेकिन अगले दो साल में उसने 3 करोड़ कमाने की योजना बनाई थी। 'किताबें ही उसकी ऱोजी रोटी का जरिया बनेंगी' आज उसका ये वक्तव्य सही साबित होने जा रहा था।

समाप्त।

© सुनीत शर्मा।

Sunday, 13 August 2017

एक पिता की डायरी।

9 August--- मैं कसम खाकर कह सकता हूँ कि आज जो भी हो रहा है उसमें मेरा कतई हाथ नहीं है, और न ही  मेरी ऐसी मंशा थी, और न ही मैंने इतना सोचा था, और न ही मैंने कभी अपनी डायरी लिखने की सोची थी। मेरी मंशा तो बस इतनी सी थी कि बस मेरा परिवार और परिवार की इज्जत सलामत रहे और इसी वजह से मैंने वो कदम उठाया था जो आज लोगों के जी का जंजाल बन गया है, समाज के लिए एक समस्या बन गया है। लेकिन समाज के सामने सत्य आना चाहिए इसलिए मैं अपनी डायरी लिखकर इसके पन्ने सोशल मीडिया पर लीक कर रहा हूँ। आप सोच रहे होंगे कि मैं कौन हूँ? किस जी के जंजाल की बात कर रहा हूँ? तो अपने बारे में मैं बस इतना बताना चाहता हूँ कि राजस्थान के एक छोटे से शहर का निवासी हूँ और एक प्राइवेट फैक्ट्री में मुनीम हूँ वो भी पिछले 20 साल से। रुपया ज्यादा नहीं कमा पाया लेकिन ईश्वर की कृपा से इज्जत रुपयों से ज्यादा कमाई है। माँ और बाबूजी के गुजरने के बाद मेरे परिवार में बस मैं, मेरी पत्नी और मेरी 18 साल की मासूम सी(?) बेटी है।

आप सोच रहे होंगे कि मैं किस समस्या की बात कर रहा हूँ? तो मैं आपको अपनी समस्या से पहले समस्या के कारण के बारे में बताने वाला हूँ।

मेरी समस्या का मूल कारण आज के समय में बढ़ती प्रगतिशीलता, बढ़ता टेलीविज़न का दखल, बढ़ता इंटरनेट का प्रसार और संचार के सुलभ माध्यम हैं और सबसे बड़ा कारण मेरे पास अपने परिवार के साथ गुजरने के लिए समय की कमी है। मौजूदा समाज में गुजर बसर करने के लिए, अपना स्तर कायम रखने के लिये और पड़ोसियों से होड़ रखने के लिए मैं केवल रुपया कमाने के चक्कर में पड़ गया और मैंने अपने परिवार को और अपने परिवार के लिए लाज़िम मेरी जरूरत को नजरअंदाज कर दिया, आज इसका खामियाजा मैं, मेरा परिवार और ये समाज उठा रहा है।

और समाज की समस्या का कारण केवल और केवल एक है। हम भारतीय पुरुषों में एक बात की कमी है कि हम अपनी सारी आदतों, बातों और संबंधों का यहाँ-वहाँ तमाम जगह बखान कर देते हैं लेकिन एक चीज हमसे छूट जाती है या यूं कहिये कि हम उसके जिक्र से बचने की हरसंभव कोशिश करते हैं। जानते हो वो चीज क्या है? हमारे घर की महिलाएं मसलन माँ, बीबी, बहन और बेटी। बताओ मुझे क्या आपने कभी इस किसी सार्वजनिक जगह पर अपने घर की महिलाओं का जिक्र किया? नहीं न। बस इसी वजह से ये सारी समस्या उत्पन्न हुई। अभी नींद आ रही है तो और विवरण कल लिखूंगा।

10 अगस्त--- कल नींद आने की वजह से समस्या के बारे में नहीं लिख पाया था। खैर अब बता रहा हूँ। समस्या मेरी थी लेकिन मेरी जरा सी लापरवाही से पूरे देश की बन गयी। वाकया कुछ यूं था... कि मेरी 18 साल की बेटी को मेरे ही मोहल्ले के एक छिछोरे टाइप लौंडे से मोहब्बत हो गयी वो भी सच्ची वाली? मेरी लौंडिया को जनाब ऐसा बरगलाया गया कि जिस लड़की को मैंने तमाम मुश्किलात का सामना करते हुए 18 साल तक पाल पोस कर बड़ा किया वो लड़की उस लौंडे के जाल में इतनी बुरी तरह फंसी कि उसने घर पर बगावत कर दी। वो उसके साथ भागने के लिए भी तैयार थी। खैर जैसे ही मुझको पता चला मैंने उसे समझाया, लेकिन बगावत का हल कभी भी बातों से नहीं निकला इसलिए मैं उसे लेकर अपने गाँव चला आया।

पर समस्या का हल नहीं मिला, वो लौंडा अपने तमाम साथियों के साथ वहां गाँव में आने लगा और मेरी लड़की की बगावत बढ़ती गयी। अब मैं ठहरा सीधा-सादा आदमी जो कभी लड़ नहीं सकता लेकिन बात जब इज्जत पर आये तो क़त्ल करने से भी नहीं हिचकूंगा। लेकिन इस परिस्थिति में मेरी स्थिति किंकर्तव्यविमूढ़ की सी थी क्योंकि बेटी मेरी थी और उस लौंडे का मैं अकेला और बूढा आदमी कुछ बिगाड़ नहीं सकता था। बिगाड़ने को तो मैं उस लौंडे का क़त्ल भी कर सकता था। कैसे? ऐसे।

उसे मैं अपनी बेटी की मार्फ़त अकेला बुलाता और भले ही वो कितना भी ताकतवर सही, कितने भी लौंडों के साथ आता, आता तो मेरे पास ही; बस एक हथौड़ी उसके सर पर ही तो मारनी थी मुझे, चाहे उसे मारने में मुझे कितनी भी मार पड़ जाती। चाहे मैं जेल में चला जाता। लेकिन जेल जाने के डर से मैंने जो कदम उठाया बस वही मेरी गलती थी। अगर मैं जेल चला जाता तो कौन पालता मेरे परिवार को? इसलिए मैंने वो कदम उठाया। अब सोने का समय है।

11 अगस्त---  यहाँ तक आते-आते आप मेरी समस्या समझ चुके होंगे और शायद मुझे भी समझ चुके होंगे। खैर आगे का किस्सा कुछ यूँ है कि जब मेरा ही सिक्का खोटा था तो मैं दूसरों के सिक्कों पर कैसे इल्जाम लगा पाता और उनको कैसे रोक पाता। उस लौंडे रुपी समस्या से निजात पाने को मेरे पास तमाम हल थे, मैं उसको कैसे भी निबटा सकता था अगरचे वो जबर्दस्ती करता तो। लेकिन यहाँ तो रजामंदी मेरी बेटी की भी थी, केवल वो लड़का ही दोषी नहीं था इसलिए बजाय लड़के को सबक सिखाने के मैंने अपनी बेटी को सबक सिखाना ज्यादा उचित समझा और आज से 20 दिन पहले, जब रात को वो सो रही थी, मैंने उसकी सोते मैं चोटी काट दी वो भी आढी-तिरछी क्योंकि मुझे पता था कि आजकल की ये फैशनेबल लड़की अपनी कटी चोटी, जिसकी लंबाई और घनापन उसकी पहचान थी, की वजह से बाहर तो जाने से रही। जनाब मेरा ये नुक्ता काम कर गया, भले ही मेरी बेटी ने मेरे इस कृत्य के लिए मुझे तमाम गलियां दी हों। गाँव में कोई पार्लर न होने की वजह से मेरी बेटी ने अपनी कटी चोटी की वजह से घर से बाहर निकलना छोड़ दिया था और और घर के सारे फ़ोन मेरे कब्जे में थे इसलिए उस लड़के से उसका संपर्क न के बराबर था। मामला धीरे-धीरे पटरी पर आता प्रतीत हो रहा था। जब गाँव की पड़ोसी महिलाओं ने मेरी बेटी की कटी चोटी देखी तो मेरी पत्नी ने उन्हें ये कहकर बहका दिया कि रात को सोते में इसकी चोटी खुदबख़ुद कटी थी और ये बेहोश हो गयी थी। इधर मैंने भी गाँव में  अपने साथियों को ये बात बताई कि मैंने किस प्रकार इस समस्या का हल निकाला है। लेकिन शायद यही वो चूक थी जिसका खामियाजा आगे चलकर सामने आया।

12 अगस्त--- दरअसल मैंने जिन साथियों को इस समस्या और इसके हल के बारे में बताया था उनमें से एक-दो भी इस समस्या से आजिज थे तो उन्होंने यही प्रकिया अपने घर पर आजमाई और उनके घर की महिलाओं ने अपने पड़ोसियों को ठीक वही सफाई दी जो की मेरी पत्नी ने अपने पड़ोसियों को दी थी। पूरे गाँव में दो दिन के अंदर तीन लड़कियों की चोटी कट गयी थी और गाँव की महिलाओं के बीच में तमाम अफवाहों का दौर चल निकला। अफवाहों का यह दौर व्हाट्सएप्प और फोन कॉल्स के जरिये गाँव से बाहर पहुँच चुका था। जितने मुँह उतनी बातें थीं। गाँव में एक लोकल अखबार वाले के कदम पड़े और उसने मेरी बेटी और उन दोनों लड़कियों की फोटो ली और अगले दिन अपने अख़बार में एक खबर "रहस्यमयी ढंग से कटी चोटियाँ!" के नाम से छाप दी। अगले रोज़ गाँव में अख़बार में फोटो आने की ललक में दो और लड़कियों की चोटियाँ कटी मिलीं और बेशक उनका भी फोटो अख़बार में आया। अब तो महिलाओं को लाइमलाइट में आने के लिए और गाँव, मोहल्ले और रिश्तेदारों का तवज्जो और हमदर्दी हासिल करने के लिए ये बहुत ही अच्छा और सुलभ बहाना मिल गया था। गाँव से गाँव और वहाँ से शहर दर शहर चोटियाँ कटने लग गईं। पूरे देश खासकर उत्तर भारत में मेरा ये कृत्य समाज के जी का जंजाल बन गया। अफवाह पर अफवाह फैलीं और इन अफवाहों के चक्कर में एक दो इंसानों को अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ा जो कि कतई गलत हुआ। इस पूरे कृत्य में मुझसे ज्यादा दोष समाज की उन महिलाओं और पुरुषों का है जिन्होंने मामले की सच्चाई जाने बिना इन अफवाहों पर यकीन किया और खासकर महिलाओं ने बेवजह की हमदर्दी हासिल करने के लिए अपनी चोटी खुद काटी।

माफ़ी की अर्जी के साथ।

विदा।


Tuesday, 25 July 2017

#स्मार्टनेस_रूल 4।

वो 25 साल का लड़का शहर का सबसे कामयाब व्यापारी, बेहद रईस, बेहद सुंदर और बलिष्ठ भी था। लेकिन उसमें एक कमी थी कि वो बहुत कम बोलता था। उसकी आदत थी कि वो अपनी बात या पूछे गए प्रश्नों के उत्तर केवल चार या पाँच शब्दों में निपटा देता था।

एक प्रोडक्ट की लॉन्चिंग के लिए की गयी प्रैस कॉन्फ्रेंस के दौरान उस 23 साल की लड़की ने, जिसने एक साल में केवल बात बना कर लोकल न्यूज़ चैनल शुरू किया था, उससे कहा, "आज मैं बहुत लोगों से शर्त लगा कर आई हूँ कि आपसे बहुत कुछ कहलवाऊंगी, आपके टिपिकल चार या पाँच शब्दों से भी ज्यादा। आप इस बारे में क्या कहना चाहते हैं।"

जवाब में उस लड़के ने कहा, "आप शर्त हार गईं।"

लड़की तुरंत लौट गयी।

Monday, 24 July 2017

#कैफेटेरिया।

#एकअनुभव।

आज से लगभग दो साल पहले मैं अपने  एक अजीज मित्र से मिलने गुरुग्राम गया था। नॉएडा पर बस से उतरकर में मेट्रो में चढ़ा और सीधा गुरुग्राम पहुँचा जहाँ मेरे मित्र ने मेरा इस्तक़बाल बहुत ही गर्मजोशी से किया। उसने मुझे उस शहर की भव्यता से परिचित कराने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। मेरी उससे करीब 11:30 पर मुलाकात हुयी थी और तबसे ही हम पुराने दिनों की, दुःख सुख की बातें करते हुए गुरुग्राम की खाक छान रहे थे। लगभग 3:00 बजे हम दोनों को एहसास हुआ कि हमने कुछ खाया तो है ही नहीं। शहर पराया था, मैं वहाँ अजनबी तो मेरे मित्र ने एक नजदीकी कैफेटेरिया का दरवाजा खोला और मुझे लेकर अंदर दाखिल हुआ। जाते ही हम एक मेज को घेरकर बैठ गए। अंदर चलते AC ने गर्मी से बेहाल हमारे तन और मन दोनों को बेहद सुकून प्रदान किया। अब ज़नाब मैं ठहरा निपट कस्बाई, मुझे पता ही नहीं था कि कैफेटेरिया एक अलग किस्म की जगह होती है, हमें अपनी जगह बैठे हुये लगभग 7 मिनट हो गईं लेकिन कोई भी वेटर हमसे आर्डर लेने नहीं आया। मेरे लिए ये बात बेहद गंभीर मुद्दा थी लेकिन मेरा मित्र AC की हवा के सुकून में इस बात से बेखबर बैठा था। जब मैंने उससे इस बाबत पूछा तो उसने जवाब दिया, "भाई, तू यहाँ पहली बार आया है न, इसलिए तुझे पता नहीं है। इस जगह को कैफेटेरिया कहते हैं रेस्तरां नहीं। यहाँ की परंपराएं अमेरिका की देन हैं। मैंने जब उससे और खुलकर बताने को कहा तो उसने बताया कि रेस्तरां में आपकी पसंद की सामग्री को आपको परोसा जाता है परंतु कैफेटेरिया की परंपरा थोड़ी जुदा किस्म की होती है यहाँ आपको अपनी पसंदीदा सामग्री काउंटर से खुद लेनी पड़ती है और बिल पहले चुकाया जाता है। खैर बात मेरी समझ में आ चुकी थी और जो कुछ भी वहां मयस्सर था उसमें से अपनी पसंदीदा सामग्री चुनकर हमने अपनी भूख मिटाई और एक बार फिर नगरभ्रमण पर निकल पड़े।

आज जब सीबीएसई का बारहवीं का रिजल्ट आ रहा है तो कैफेटेरिया का अनुभव मुझे फिर से याद आ गया। ये जो हमारी जिंदगी होती है न ये भी एक कैफेटेरिया के जैसी होती है नाकी एक रेस्तरां जैसी। जिंदगी में जो कुछ भी हमको चाहिए होता है वो हमको खुद जुटाना पड़ता है और इसके लिए मेहनत रुपी बिल पहले चुकाना पड़ता है। अगर जिंदगी को रेस्तरां समझोगे तो निश्चित ही ये बड़ी भूल साबित होगी क्योंकि दुनिया का कोई भी इंसान तुमको सफलता, शोहरत और धन दौलत नहीं देगा और न ही ये चीजें किसी दुकान पर मिलतीं; इन सारी चीजों को खुद अर्जित करना पड़ता है। अभी कुछ देर में आपका रिजल्ट आने वाला है और आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि इस रिजल्ट के मायने केवल आगे किसी अच्छे इंस्टिट्यूट में दाखिला लेने तक सीमित हैं इसलिए आपका रिजल्ट अगर ख़राब है तो ज्यादा निराश होने की जरूरत नहीं है भविष्य में कई मौके हैं जहाँ आप खुद को खुद की नजरों में साबित कर पाओगे और जिनका रिजल्ट अच्छा है उनको ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं है क्योंकि आगे कई ज्यादा और कहीं बेहद मुश्किल इम्तिहानों से आपका सामना होने वाला है।

एक बात और ध्यान रखना कि जिंदगी आपको नहीं चुनती, आप जिंदगी को चुनते हो। इसलिए अपनी बेहतर जिंदगी चुनो और अपने प्रयासों को सही दिशा में मोड़ो। पुनश्च, जिंदगी एक कैफेटेरिया है और जो कुछ भी आप चाहते हो वो यहाँ आपको खुद जुटाना होगा।

भविष्य की शुभकामनाओं के साथ।

सोच रहा हूँ कि एक और कहानी आपको सुना दूँ क्योंकि कल से विद्यालय भी खुल रहा है और मैं अगले दो महीने मोबाइल और इंटरनेट से दूर भी रहूँगा।

कल शाम को अपने एक पुराने छात्र से मुलाकात हो गयी। उसके बारे में मुझे इतना तो मालूम था कि वो परिवहन निगम में बस कंडक्टर बन गया है। एक बदलाव मैंने उसमें पाया कि वो पहले से काफी ज्यादा हष्टपुष्ट हो गया है बिल्कुल पहलवानों जैसा माँसल, लंबा तो वो था ही। खैर कुछ देर की औपचारिक बातों के बाद मैंने उसकी मांसपेशियों की तरफ इशारा करते हुए मजाक में पूछ लिया कि अब क्या पहलवानी करने का इरादा है। जवाब में वो बोला, "गुरूजी इस शरीर को बनाने के पीछे एक कहानी है।"
कहानी सुनना, सुनाना और पढ़ना तो मेरा प्रिय शगल है तो जिज्ञासा बतौर मैंने उससे कहा कि सुनाओ। उसने अपनी आपबीती सुनाई जो कि इस प्रकार थी।

कंडक्टर बनते ही उसकी ड्यूटी कासगंज-मथुरा रुट पर लग गयी और उसे उस रुट पर चलते हुए केवल दस ही दिन हुए थे कि कासगंज से एक लंबा-चौड़ा पहलवान टाइप आदमी उसकी बस में चढ़ा और जब कंडक्टर ने उससे टिकट बनवाने के लिए कहा तो वो छः फुटा पहलवान खड़ा हुआ और उसने अपनी धमकी भरी आवाज में कहा, "कबीरा ने आज तक कभी टिकट लेकर सफर नहीं किया।" उसकी आवाज और शरीर देखकर कंडक्टर डर गया और कंडक्टर की उससे दुबारा कहने की हिम्मत ही नहीं हुई। और इस प्रकार उस पहलवान ने उस दिन फ्री में बस की यात्रा की। कंडक्टर ने सोचा कि एक दिन की ही तो बात है। परंतु अगले दिन भी वो पहलवान उसी बस में आ पहुँचा और टिकट लेने की कहने पर उसने अपना वही जवाब दिया "कबीरा ने आज तक कभी टिकट लेकर सफर नहीं किया" । उस रोज भी उसने फ्री यात्रा की।

अब तो ये रोज़ की बात होने लगी। वो रोज फ्री में जाने लगा। पंद्रह दिन बाद कंडक्टर ने सोचा कि इसे सबक सिखाना पड़ेगा और उसी दिन से उसने अपनी खुराक दुगनी करदी और रोज सुबह कसरत करना भी शुरू कर दिया। इधर पहलवान का रोज उसकी बस में सफर करना जारी रहा। आखिरकार दो महीनों की कड़ी मेहनत, कसरत और खुराक की बदौलत कंडक्टर का शरीर भी उस पहलवान के समतुल्य हो गया और एक दिन जब वो पहलवान बस में बैठा और टिकट की कहने पर उसने अपना जमा जमाया वाक्य बोला तो कंडक्टर ने उसका गिरेबान पकड़ लिया और कहा कि "आखिर क्यों नहीं किया, और आज तू टिकट लेकर ही सफर करेगा नहीं तो तुझे अभी यहीं मारूँगा।"
पहलवान ने उससे बड़े ही नम्र लहजे में कहा कि उसने आज तक कभी टिकट लेकर इसलिए सफर नहीं किया क्योंकि वो हमेशा मासिक पास बनवा लेता है।

हँसी आ रही होगी! आना लाजिमी भी है और ये कोई सत्य घटना भी नहीं है बस एक और पुरानी सी कहानी है। लेकिन जैसे कि मैं कहता हूँ हर कहानी से और हरेक की गलती से कुछ सबक ले लेना चाहिए तो आइये इस कहानी से मिलने वाले सबक पर चलते हैं।

वास्तव में जैसे ही कोई बड़ी समस्या हमारे सामने आती है तो बजाय समस्या के बारे में सोचने के हम उसके बड़े बड़े हल सोचने लग जाते हैं जबकि हमको सबसे पहले समस्या को देखना चाहिए उसके बारे में सोचना चाहिए। अगर आप गणित की किताब उठाएंगे तो पाएंगे सबसे ज्यादा Problems गणित की किताब में ही मिलती हैं और ऐसी कोई भी Problem नहीं होती जिसका कोई Solution न हो, ये भी आप गणित की किताब से सीख जायेंगे। तो जनाब समस्याओं के छोटे हल खोजना सीखिए वर्ना बिना समस्या को जाने आप अपने लिए कई और समस्याएं उत्पन्न कर लेंगे।

बादबाकी बडेबूढ़े कह गए हैं कि अगर आप समस्या को नहीं सुलझा सकते तो आप खुद एक समस्या हैं, तो सही ही कह गए होंगे।

#स्मार्टनेस_रूल

वैसे तो मैं हमेशा राजनीति और धर्म से सम्बंधित कुछ भी लिखने से परहेज करता हूँ परंतु आज राजनीति से संबंधित लिखना पड़ रहा है; इसकी वजह केवल स्मार्टनैस है, जिसकी कि मैं हरदम बातें करता हूँ। खैर आप पढ़िए।

अभी, हाल-फिलहाल जुलाई के महीने में हमारे प्रधान सेवक माननीय मोदी जी अमेरिका और इस्राइल के दौरे पर गए थे, और उनका पहला पड़ाव अमेरिका था। प्रोटोकॉल बतौर वहाँ की प्रथम महिला (First Lady) मतलब 'लेडी ट्रम्प' के लिए वो भारत से उपहार बतौर कुछ चीजें ले गए थे जिनमें शामिल थे;

'हिमाचल की मशहूर कारीगरी का नमूना एक चाँदी का ब्रेसलेट'

'काँगड़ा की मशहूर चाय और शहद'

'जम्मू और हिमाचल में हाथ से बुनकर तैयार होने वाला शॉल।'

खैर इसके बाद माननीय प्रधान सेवक जी इजराइल पहुँचे और वहाँ पर उन्होंने कुछ देर के लिए एक टोपी पहनी (पहले कमेन्ट में उसका फोटो है जो कि गूगल से लिया है मैंने, फोटो मैंने जाँच लिया है; सही है।)

अगर आप गूगल पर हिमाचली कैप सर्च करेंगे तो आपको पता चलेगा कि मोदी जी वही कैप पहने हुए हैं।

आखिर हिमाचल पर इतना प्यार क्यों? जवाब बेहद आसान है, वहां कांग्रेस का राज है और अगली जनवरी में वहाँ चुनाव होने हैं।

जहाँ अन्य पार्टियाँ अपने मतलब हल करने में व्यस्त हैं, वहाँ हमारे माननीय अभी से प्रचार करना शुरू कर दिए हैं।

मोदीजी की दूरदृष्टि और चतुराई का अंदाजा आप मंदिर, मस्जिद, या अपने AC रूम में बैठकर नहीं लगा सकते।

बादबाकी बड़े बूढे कह गए हैं कि 'भविष्य छुपा हुआ है लेकिन आपके प्रयास उसे ढूंढ निकालेंगे।'

शुभरात्रि।

शेयर करो या नहीं करो , खबर तो पहुंचेगी।
#एकसबक।

एक व्यक्ति (समझ लो मैं हूँ) अपनी आठ साल की बेटी को पहली बार अपने गाँव घुमाने के लिए लेकर जा रहा था। बस से उतरकर एक पगडंडी पर वो दोनों पैदल चल रहे थे। बसस्टॉप से उनका गाँव एक किलोमीटर की दूरी पर था। चलते-चलते अचानक उस व्यक्ति ने देखा कि बीच पगडंडी पर एक बड़ा पत्थर पड़ा हुआ है। अब अगर वो चाहते तो पत्थर के दायें-बायें होकर भी निकल सकते थे लेकिन उस व्यक्ति ने दूसरे लोगों की खातिर उस पत्थर को उस पगडंडी से हटाने की खातिर जैसे ही धक्का लगाना शुरू किया तो उसकी बेटी ने उससे पूछा, "पापा, क्या मैं इस पत्थर को खिसका सकती हूँ?"

व्यक्ति ने पत्थर पर से अपने हाथ हटाये और कुछ पल सोचने के पश्चात बोला, "बिल्कुल हटा सकती हो लेकिन अपनी पूरी ताकत लगानी पड़ेगी। लगा सकती हो?"

"हाँ, लगा सकती हूँ और हटा भी सकती हूँ।" और इतना कहने के बाद उस आठ साल की बच्ची ने अपने दोनों हाथ उस पत्थर पर टिकाये और उसको अपनी पूरी ताकत से धक्का दिया।

तो जनाब, पत्थर अपनी जगह से टस से मस न हुआ। (जनाब आप चमत्कार की उम्मीद न करें।) पत्थर हिले भी कैसे? लड़की का वजन 20 किलो और पत्थर होगा कोई पचास किलो का।

"पापा ये तो हिला ही नहीं।" उसने मासूमियत से उस व्यक्ति से कहा।

"ये हिलेगा भी और ये हट भी जायेगा बिटिया परंतु अपनी सारी ताकत जुटाओ और इस पर लगाओ।" उस व्यक्ति ने बेहद सौम्य स्वर में उसे निर्देशित किया।

अब उस छोटी सी लड़की ने अपनी पूरी ताकत को अपने बाजुओं में समेटा और पत्थर पर एक बहुत जोर का धक्का लगाया लेकिन पत्थर फिर भी न हिला। आखिरकार तीसरी कोशिश में जब उससे पत्थर बिल्कुल भी नहीं हिला तो उसने अपने पापा से फिर पूछा, "पापा, अबकी बार तो पूरी ताकत लगा दी लेकिन ये पत्थर तो हिला ही नहीं।"

तब उसके पापा ने जवाब दिया, "बिटिया तुमने अपनी पूरी ताकत अभी लगायी ही नहीं है। तुम्हारी ताकत का छोटा सा हिस्सा मैं भी हूँ लेकिन तुमने अपनी ताकत बतौर मुझे इस्तेमाल नहीं किया। अगर तुम मुझे अपनी ताकत मानती तो ये पत्थर कब का हट चुका होता।"

खैर बिटिया ने उसके बाद अपनी पूरी ताकत लगायी और रास्ते से पत्थर हट गया था।

आप सोच रहे होंगे कि कहानी ख़त्म तो बिल्कुल सही सोच रहे हैं, लेकिन सबक अभी शुरू हुए हैं।

अपने घमंड के जेरेसाया हम अपनी वास्तविक शक्ति को भूल चुके हैं जो कि परिवार और हमारे मित्रों में समाहित होती है। आपके बुरे वक्त में केवल आपके परिवार वाले और आपके परममित्र ही काम आयेंगे, क्योंकि वो ही आपकी शक्ति को सम्पूर्ण करते हैं। अपने परिवार से और अपने मित्रों से मदद माँगने में कभी मत झिझको चाहे आपके सम्बन्ध भले ही उनसे ख़राब चल रहे हों। बुरे वक्त में केवल आपके अपने काम आएंगे, फेसबुक पर मौजूद 3000 फ्रेंड्स नहीं।

बादबाकी बडेबूढ़े कह गए हैं कि 'आपका घुटना आपके पेट की तरफ ही झुकता है' तो गलत तो नहीं कह गए होंगे।

शुभरात्रि।



#इन्वेस्टमेंट।

उसेन बोल्ट के नाम से भला कौन परिचित नहीं होगा। विश्व का सबसे तेज धावक है। जनाब ने पिछले तीन ओलम्पिक में आठ स्वर्ण पदक जीते हैं जो कि नौ थे लेकिन एक दुर्भाग्यवश इनसे वापस ले लिया गया था। खैर इन आठ स्वर्णपदकों को पाने के लिए जनाब ने ओलम्पिक में 164 सेकंड दौड़ लगायी है, जी हाँ केवल 164 सेकंड और इन आठ स्वर्णपदकों की बदौलत इनकी पिछले सात सालों की आमदनी, फ़ोर्ब्स के अनुसार, $157 मिलियन है जो कि अपने आप में एक बहुत बड़ी रकम है।

अगर मोटा-मोटा हिसाब लगाया जाये तो ओलम्पिक में एक सेकंड दौड़ने के इनको एक मिलियन डॉलर मिले हैं। जो कि किसी लिहाज से कम रकम नहीं कही जा सकती। इस रकम की बाबत सोचकर ही आत्मा प्रसन्न हो जाती है।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक सेकंड दौड़ने के एक मिलियन लेने के लिए इन्होंने कितना निवेश (इन्वेस्टमेंट) किया है? आप सोच रहे होंगे कि ये जनाब तो एथलीट हैं जबकि निवेश तो केवल बिजनेसमैन करते हैं। तो जनाब, मेरे अनुसार हर वो चीज, वो जरिया; चाहे वो रुपयों के रूप में हो या किसी और रूप में, जो हम किसी हासिल की खातिर लगाते हैं वो निवेश की श्रेणी में आता है।

जब बारह साल की उम्र में ये अपने स्कूल के सबसे तेज धावक बने तो उसके बाद लगातार दस साल तक इन्होंने कड़ी मेहनत करके 2008 के ओलंपिक में जगह बनाई। उस समय इनकी उम्र 22 साल की थी। लगातार दस साल दिन में 4 घण्टे इन्होंने अपनी मेहनत जिम और ट्रैक पर निवेश की और ओलम्पिक में अपनी जगह बनाई और खूब बनाई।

इन्होंने अपने जीवन के 14600 घण्टे अपने पहले ओलम्पिक में जाने के लिए ईमानदारी से निवेश किये और बहुत कुछ हासिल किया।

तो मेरे प्यारे छात्रों आपने कुछ निवेश किया क्या? नहीं किया तो करिए, क्योंकि जब तक लागत नहीं लगेगी तब तक आमदनी भी नहीं होगी और लागत या निवेश का मतलब केवल रुपया पैसा लगाना ही नहीं होता। आप मेहनत भी निवेश कर सकते हैं लेकिन सही दिशा में होनी चाहिए, चाहे वो किसी भी क्षेत्र में क्यों न हो।

बादबाकी बड़े बूढ़े तो कह ही गए हैं कि सोते हुए शेर के मुँह में हिरन खुद नहीं आ जाता।

शुभरात्रि।

Wednesday, 19 July 2017

#स्मार्टनेस 3


ये वाकया बहुत पुराना है, तबका जब भारत में रेडीमेड कपड़े दर्जियों की दुकानों पर मिलते थे और उनको खरीदने के लिए कोई विशेष दुकान नहीं होती थी।

उस समय दिल्ली में एक बहुत पुराने और प्रसिद्द दर्जी, जो कि रेडीमेड कपड़े भी बेचता था, की दुकान के सामने दो कमउम्र भाइयों ने अपनी रेडीमेड की दुकान खोली। बड़ा भाई रामू मुख्य दर्जी था जो कि ऊपर बैठकर कपड़े सिलता रहता था व छोटा भाई महेश गल्ला संभालता था, आजकल की भाषा में कहें तो काउंटर पर बैठता था। जैसा कि अपेक्षित था अगले एक महीने में वो केवल एक सूट ही बेच पाए। निराश बड़े भाई ने अपनी दुकान बंद करकर कोई और धंधा करने का मन बना लिया था कि तभी छोटे भाई ने बड़े भाई से एक और ग्राहक के आने तक इन्तजार करने को कहा। योजना बन चुकी थी।

करीब दस दिन बाद एक सज्जन उनकी दुकान पर सूट खरीदने के लिए पहुंचे। जाते ही उन्होंने महेश से सूट दिखाने के लिए कहा। महेश, जो कि ऊँचा सुनता था, की समझ में नहीं आया कि ग्राहक क्या माँग रहा है। महेश ने ग्राहक से दुबारा पूछा कि उसको क्या चाहिए? तभी ऊपर से रामू की तेज आवाज आई "ओ बहरे! भाईसाहब को सूट दिखा, सूट! भाईसाहब आप जरा तेज बोलिये इसके कान ख़राब है।" एक आदेश उसने ग्राहक को भी दे दिया।

ग्राहक भी सोच रहा था कि कहाँ आकर फंस गया हूँ। खैर काफी मगजमारी, काफ़ी मशक्कत और तेज बोलकर अपनी काफी सारी ऊर्जा ख़त्म करके जब ग्राहक ने अपने पसंदीदा सूट की कीमत पूछी तो रामू ने कहा कि कीमत तो उसका बड़ा भाई बताएगा। रामू ने तेज आवाज में उससे पूछा, "भाई, नीला सूट कितने रूपये का है?

ऊपर से आवाज आई, "वही, जिसकी बाजू में चमड़ा लगा है?"

"क्या? दुबारा बोलो।"

"अरे बहरे, चमड़े की बाजू वाला न?" ऊपर से आती हुई आवाज अब काफी तेज थी और झल्लाहट मिश्रित भी।

"हाँ, वही।"

"डेढ़ सौ रूपये का।" रामू की आवाज आई।

"ठीक है।" महेश ने कहा और ग्राहक की तरफ मुखातिब होकर बोला, "एक सौ रुपया और हम मोलभाव नहीं करते।"

ग्राहक की तो पौ बारह हो गयी। उसने बिना मोलभाव के तुरंत सौ रूपये अदा किये और अपना सूट उठा कर वहाँ से तुरंत चंपत हो गया।

इधर रामू ने जो सूट अस्सी रूपये में बिकने के लिए तैयार किया था वो महेश के बहरे होने के नाटक की वजह से सौ रूपये में बेचा गया।

और अगले पंद्रह दिन बाद उनकी दुकान के सारे रेडीमेड कपड़े बिक चुके थे।

आप इसे ठगी कह सकते हो लेकिन मेरी नजर में ये स्मार्टनैस है।

शुभरात्रि।