#मैंभीपरेशानहूँ।
"अजी सुनती हो! घर में कितने नोट हैं 500 और 1000 के?"
"अजी 500 का तो एक भी नहीं लेकिन 1000 के चार नोट रखे हैं।"
"मेरी जेब में तो एक भी नहीं, जरा उनमें से एक नोट लाना।"
"क्यों? क्या करोगे? वो तो बंद हो गए।"
"अरे फेसबुक पर चल रहे हैं। इनके फोटो को अगर रचनात्मकता से खींचा जाये तो ये फेसबुक पर मुझे लाइक और कमेंट कमा कर देंगे। एक निकाल कर तो लाओ या चारों निकाल लाओ। अभी एक विचार आया है।"
चारों नोट मेरी पत्नी ने निकाल कर मेरे सामने रख दिए। अब मैंने नोटों को अपने टिफिन में नीचे बिछाया, बिलकुल एल्युमिनियम फॉयल की तरह और चिल्लाया कि जरा चार रोटी लेकर तो आओ ताकि मैं इसका फोटो खींच कर फेसबुक पर डाल सकूं। अब शायद मेरी पत्नी ने सुना या न सुना लेकिन उस समय अचानक एक अजीब घटना हुई और एक नोट टिफिन में से उड़कर बाहर आ गया और बोला,
"बस, निकल गया मतलब मुझसे? मुझे पहचानता है? मैं वही हूँ जो तेरी जेब में 3 तारीख को एक 100 के नोट के साथ रह रहा था और तुझे एक दुकान पर टंगी हुयी जीन्स पसन्द आयी थी। मेरे भरोसे तू उस दुकान में घुसा लेकिन मुझे बचाने की खातिर अपना मन मार कर खाली हाथ लौट आया था। घर आते ही अपनी बीबी को बुलाकर उसके हाथ में सौंप कर तूने कहा था कि बड़ी मुश्किल से बचाकर लाया हूँ।"
"सही कह रहे हो मित्र।", तभी टिफिन से निकल कर उड़ता हुआ दूसरा नोट निकला। "ये तो मुझे भी नहीं पहचान पा रहा होगा। मैं शायद तुम्हारे टिफिन में आने के अगले दिन वहाँ आया था। इस शख्श की मम्मी की तबियत खराब थी और इसकी माताजी ने बोला भी कि मुझे डॉ को दिखा ला, लेकिन ये कम्बख्त मेरे मोह में पागल था और अपनी मम्मी के लिए एक केमिस्ट से 20 रूपये की दवा ले गया और मुझे निकाल कर उस टिफिन में क़ैद कर दिया।"
तभी तीसरा नोट आया और बोला, "भाई लोगों, मेरी कहानी तो और भी विस्मित कर देने वाली है। मुझे बचाने की खातिर इसने अपनी एकमात्र बेटी को रुला दिया था और उसे वो 400 रूपये वाली गुड़िया न दिलवाई थी। वो रोते हुए घर आई और ये हँसते हुए मुझे टिफिन में क़ैद कर रहा था। ये वो इंसान है जो अपनी बेटी का न हुआ वो किसी और का क्या होगा।"
मेरा दिमाग घूम गया था, घबराहट हावी होती जा रही थी। और तभी चौथा नोट निकला और बोला, "भाई लोगों, मेरा और इसका संपर्क आज ही हुआ है लेकिन मुझे इतना पता है क़ि कई सालों से इसकी बीबी मेरा इसकी तरह ख्याल रखती आयी है। मैं पिछले पाँच सालों से उसके पास हूँ तो इस इंसान को मैं बेहद अच्छी तरह से जानता हूँ। ये जो इंसानी प्रवृति है न ये मतलबी होती है। जब तक इनको आपसे मतलब है तब तक ये आपको भगवान मानेंगे लेकिन जैसे ही आपसे इनका मतलब हल हुआ या असफल हुआ ये आपकी बेकद्री करने से भी नहीं चूकेंगे। जैसा कि आप तीनों देख रहे होंगे की कोई हमको टॉयलेट पेपर की जगह प्रयोग कर रहा है, कोई हमारी बत्ती बनाकर दुनिया को उनका प्रयोग सिखा रहा है, कोई हममें चने लपेट रहा है। भाइयो यही इंसानी प्रवृत्ति है। ये अपने माँ-बाप, रिश्तेदार, सगे-सम्बन्धियों, मित्रों और हर जान-पहचान वाले व्यक्ति के साथ रोज ऐसा ही व्यवहार करते हैं जैसा कि आज ये हमारे साथ कर रहा है। चुपचाप सह लो। अब हमारी नयी पीढ़ी आने वाली है अब हर इंसान का सारा प्यार उनको स्थानांतरित होगा। ज्यादा चिंता न करो अपनी पुरानी शक्ति पर इतराओ क्योंकि किसी भी घर में माँ-बाप से ज्यादा तरजीह हमको ही मिली थी। हमारा तो नया जन्म होगा, इतने शक्तिशाली न रहें लेकिन 100, 50 तो रहेंगे हम। हम तब भी शक्तिशाली रहेंगे। इन इंसानों की आँखें कभी तो खुलेंगी।"
और अचानक मेरी आँख खुल गयी। घडी देखी तो सुबह के 6 बजे थे। मैंने अपनी धर्मपत्नीजी को तुरंत जगाया और पूछा कि 500 और 1000 के नोट गिने थे क्या? जवाब मिला कि 1000 के चार नोट हैं बादबाकी 100 के और 50 के मिलाकर 2000 हैं। मैंने उससे तुरंत कहा कि इन हज़ार के चारों नोटों को मेरी पुस्तकों के संग्रह में रख देना। बच्चा जब बड़ा होगा तो वो देख लेगा। उसने पूछा कि चार हज़ार का नुक्सान कैसे भरोगे?
बस इतना कहा कि दो दिन 12 घंटे के बजाय 16 घंटे काम करके।
शेयर तो आप करोगे नहीं। है न?
"अजी सुनती हो! घर में कितने नोट हैं 500 और 1000 के?"
"अजी 500 का तो एक भी नहीं लेकिन 1000 के चार नोट रखे हैं।"
"मेरी जेब में तो एक भी नहीं, जरा उनमें से एक नोट लाना।"
"क्यों? क्या करोगे? वो तो बंद हो गए।"
"अरे फेसबुक पर चल रहे हैं। इनके फोटो को अगर रचनात्मकता से खींचा जाये तो ये फेसबुक पर मुझे लाइक और कमेंट कमा कर देंगे। एक निकाल कर तो लाओ या चारों निकाल लाओ। अभी एक विचार आया है।"
चारों नोट मेरी पत्नी ने निकाल कर मेरे सामने रख दिए। अब मैंने नोटों को अपने टिफिन में नीचे बिछाया, बिलकुल एल्युमिनियम फॉयल की तरह और चिल्लाया कि जरा चार रोटी लेकर तो आओ ताकि मैं इसका फोटो खींच कर फेसबुक पर डाल सकूं। अब शायद मेरी पत्नी ने सुना या न सुना लेकिन उस समय अचानक एक अजीब घटना हुई और एक नोट टिफिन में से उड़कर बाहर आ गया और बोला,
"बस, निकल गया मतलब मुझसे? मुझे पहचानता है? मैं वही हूँ जो तेरी जेब में 3 तारीख को एक 100 के नोट के साथ रह रहा था और तुझे एक दुकान पर टंगी हुयी जीन्स पसन्द आयी थी। मेरे भरोसे तू उस दुकान में घुसा लेकिन मुझे बचाने की खातिर अपना मन मार कर खाली हाथ लौट आया था। घर आते ही अपनी बीबी को बुलाकर उसके हाथ में सौंप कर तूने कहा था कि बड़ी मुश्किल से बचाकर लाया हूँ।"
"सही कह रहे हो मित्र।", तभी टिफिन से निकल कर उड़ता हुआ दूसरा नोट निकला। "ये तो मुझे भी नहीं पहचान पा रहा होगा। मैं शायद तुम्हारे टिफिन में आने के अगले दिन वहाँ आया था। इस शख्श की मम्मी की तबियत खराब थी और इसकी माताजी ने बोला भी कि मुझे डॉ को दिखा ला, लेकिन ये कम्बख्त मेरे मोह में पागल था और अपनी मम्मी के लिए एक केमिस्ट से 20 रूपये की दवा ले गया और मुझे निकाल कर उस टिफिन में क़ैद कर दिया।"
तभी तीसरा नोट आया और बोला, "भाई लोगों, मेरी कहानी तो और भी विस्मित कर देने वाली है। मुझे बचाने की खातिर इसने अपनी एकमात्र बेटी को रुला दिया था और उसे वो 400 रूपये वाली गुड़िया न दिलवाई थी। वो रोते हुए घर आई और ये हँसते हुए मुझे टिफिन में क़ैद कर रहा था। ये वो इंसान है जो अपनी बेटी का न हुआ वो किसी और का क्या होगा।"
मेरा दिमाग घूम गया था, घबराहट हावी होती जा रही थी। और तभी चौथा नोट निकला और बोला, "भाई लोगों, मेरा और इसका संपर्क आज ही हुआ है लेकिन मुझे इतना पता है क़ि कई सालों से इसकी बीबी मेरा इसकी तरह ख्याल रखती आयी है। मैं पिछले पाँच सालों से उसके पास हूँ तो इस इंसान को मैं बेहद अच्छी तरह से जानता हूँ। ये जो इंसानी प्रवृति है न ये मतलबी होती है। जब तक इनको आपसे मतलब है तब तक ये आपको भगवान मानेंगे लेकिन जैसे ही आपसे इनका मतलब हल हुआ या असफल हुआ ये आपकी बेकद्री करने से भी नहीं चूकेंगे। जैसा कि आप तीनों देख रहे होंगे की कोई हमको टॉयलेट पेपर की जगह प्रयोग कर रहा है, कोई हमारी बत्ती बनाकर दुनिया को उनका प्रयोग सिखा रहा है, कोई हममें चने लपेट रहा है। भाइयो यही इंसानी प्रवृत्ति है। ये अपने माँ-बाप, रिश्तेदार, सगे-सम्बन्धियों, मित्रों और हर जान-पहचान वाले व्यक्ति के साथ रोज ऐसा ही व्यवहार करते हैं जैसा कि आज ये हमारे साथ कर रहा है। चुपचाप सह लो। अब हमारी नयी पीढ़ी आने वाली है अब हर इंसान का सारा प्यार उनको स्थानांतरित होगा। ज्यादा चिंता न करो अपनी पुरानी शक्ति पर इतराओ क्योंकि किसी भी घर में माँ-बाप से ज्यादा तरजीह हमको ही मिली थी। हमारा तो नया जन्म होगा, इतने शक्तिशाली न रहें लेकिन 100, 50 तो रहेंगे हम। हम तब भी शक्तिशाली रहेंगे। इन इंसानों की आँखें कभी तो खुलेंगी।"
और अचानक मेरी आँख खुल गयी। घडी देखी तो सुबह के 6 बजे थे। मैंने अपनी धर्मपत्नीजी को तुरंत जगाया और पूछा कि 500 और 1000 के नोट गिने थे क्या? जवाब मिला कि 1000 के चार नोट हैं बादबाकी 100 के और 50 के मिलाकर 2000 हैं। मैंने उससे तुरंत कहा कि इन हज़ार के चारों नोटों को मेरी पुस्तकों के संग्रह में रख देना। बच्चा जब बड़ा होगा तो वो देख लेगा। उसने पूछा कि चार हज़ार का नुक्सान कैसे भरोगे?
बस इतना कहा कि दो दिन 12 घंटे के बजाय 16 घंटे काम करके।
शेयर तो आप करोगे नहीं। है न?
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