हिन्दी दिवस विशेष।
बात काफी पुरानी है, तबकी है जब मैं आगरा पढ़ने जाया करता था, साल 2001 की। तब भारत में मोबाइल नया नया ही आया था और हर किसी के पास होता भी नहीं था। उस ज़माने में हर गली-नुक्कड़ पर एसटीडी-पीसीओ की दुकान होती थी। आगरा जैसे शहर में, संजय प्लेस जैसे इलाके में ये दुकानें बहुतायात में थीं। संजय प्लेस पर कावेरी टॉवर करके एक इमारत है, उसी में हमारा इंस्टिट्यूट था व और भी कई सारी दुकानें तथा कार्यालय थे। इसी इमारत के ग्राउंड फ्लोर पर एक एसटीडी बूथ था वहाँ पर 10 बजे से दो बजे तक एक लड़की पार्ट-टाइम जॉब करती थी। आगरा की टिपिकल लड़की थी, कान्वेंट की पढ़ी हुयी। एक दिन मुझे अचानक किसी काम से अपने सहपाठी को, जो कि उस दिन पढ़ने नहीं आया था, फोन करने की जरूरत महसूस हुई तो मैं बेसमेंट से निकालकर ऊपर उसी एसटीडी बूथ पर पहुँच गया। वो लड़की वहीँ कुर्सी पर बैठी हुई थी। मैंने वहाँ पहुंचकर, स्टूल पर बैठकर सामने रखा फ़ोन अपनी तरफ खींचा और सामान्य लहजे में कहा "एक फोन करना है।"
मेरे इतना कहते ही लड़की ने मुझे घूरकर देखा और फोन अपनी ओर खींच लिया और बोली, "नम्बर बोलिये।"
मुझे बहुत तेज गुस्सा आया लेकिन मैंने कुछ कहा नहीं न ही कोई प्रतिक्रिया दी। मैंने केवल नम्बर बोला, "तीन सौ उनहत्तर दो सौ नवासी।"
उसने मुझे दुबारा घूरकर देखा जैसे कि मैं कोई परग्रही था और 'जादू' वाली भाषा बोल रहा था। अपने उसी अंदाज में उसने फिर पूछा ,"ढंग से बताइये।"
मैंने अबकी बार नम्बर ढंग से बताया, "तीन लाख उनहत्तर हजार दो सौ नवासी।" नंबर का हिसाब मैंने मन ही मन लगा लिया था।
अब उसने मुझे घूरकर नहीं देखा था बल्कि मुस्कुरा कर देखा और फ़ोन मेरी ओर खिसका दिया था। मैंने भी एक मुस्कान उस पर डाली और नम्बर मिलाकर बात करने में मशगूल हो गया।
उस दिन हिन्दी की गिनतियाँ तथाकथित अंग्रेजी मानसिकता पर भारी पड़ गयीं थीं।
आज हिन्दी दिवस है ज्यादा तो आप पर हो नहीं पाएगा तो बस इतना करो कि आपके खुद के या आसपास के जो बच्चे हैं उन्हें 'सेवेंटी फोर' माने चौहत्तर होते हैं ये बता दो मतलब हिन्दी की गिनती ही सिखा दो। इससे भी हमारी हिन्दी को थोड़ा सा फायदा मिलेगा।
बादबाकी छोटे-मोटे दुकानदारों को "चौदह कितने अंकलजी?" के जवाब में "सिक्सटीन" बताकर बच्चों को ठगते हुए तो आपने भी देखा होगा।
हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।
©SunitSharma.
बात काफी पुरानी है, तबकी है जब मैं आगरा पढ़ने जाया करता था, साल 2001 की। तब भारत में मोबाइल नया नया ही आया था और हर किसी के पास होता भी नहीं था। उस ज़माने में हर गली-नुक्कड़ पर एसटीडी-पीसीओ की दुकान होती थी। आगरा जैसे शहर में, संजय प्लेस जैसे इलाके में ये दुकानें बहुतायात में थीं। संजय प्लेस पर कावेरी टॉवर करके एक इमारत है, उसी में हमारा इंस्टिट्यूट था व और भी कई सारी दुकानें तथा कार्यालय थे। इसी इमारत के ग्राउंड फ्लोर पर एक एसटीडी बूथ था वहाँ पर 10 बजे से दो बजे तक एक लड़की पार्ट-टाइम जॉब करती थी। आगरा की टिपिकल लड़की थी, कान्वेंट की पढ़ी हुयी। एक दिन मुझे अचानक किसी काम से अपने सहपाठी को, जो कि उस दिन पढ़ने नहीं आया था, फोन करने की जरूरत महसूस हुई तो मैं बेसमेंट से निकालकर ऊपर उसी एसटीडी बूथ पर पहुँच गया। वो लड़की वहीँ कुर्सी पर बैठी हुई थी। मैंने वहाँ पहुंचकर, स्टूल पर बैठकर सामने रखा फ़ोन अपनी तरफ खींचा और सामान्य लहजे में कहा "एक फोन करना है।"
मेरे इतना कहते ही लड़की ने मुझे घूरकर देखा और फोन अपनी ओर खींच लिया और बोली, "नम्बर बोलिये।"
मुझे बहुत तेज गुस्सा आया लेकिन मैंने कुछ कहा नहीं न ही कोई प्रतिक्रिया दी। मैंने केवल नम्बर बोला, "तीन सौ उनहत्तर दो सौ नवासी।"
उसने मुझे दुबारा घूरकर देखा जैसे कि मैं कोई परग्रही था और 'जादू' वाली भाषा बोल रहा था। अपने उसी अंदाज में उसने फिर पूछा ,"ढंग से बताइये।"
मैंने अबकी बार नम्बर ढंग से बताया, "तीन लाख उनहत्तर हजार दो सौ नवासी।" नंबर का हिसाब मैंने मन ही मन लगा लिया था।
अब उसने मुझे घूरकर नहीं देखा था बल्कि मुस्कुरा कर देखा और फ़ोन मेरी ओर खिसका दिया था। मैंने भी एक मुस्कान उस पर डाली और नम्बर मिलाकर बात करने में मशगूल हो गया।
उस दिन हिन्दी की गिनतियाँ तथाकथित अंग्रेजी मानसिकता पर भारी पड़ गयीं थीं।
आज हिन्दी दिवस है ज्यादा तो आप पर हो नहीं पाएगा तो बस इतना करो कि आपके खुद के या आसपास के जो बच्चे हैं उन्हें 'सेवेंटी फोर' माने चौहत्तर होते हैं ये बता दो मतलब हिन्दी की गिनती ही सिखा दो। इससे भी हमारी हिन्दी को थोड़ा सा फायदा मिलेगा।
बादबाकी छोटे-मोटे दुकानदारों को "चौदह कितने अंकलजी?" के जवाब में "सिक्सटीन" बताकर बच्चों को ठगते हुए तो आपने भी देखा होगा।
हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।
©SunitSharma.
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