Saturday, 24 September 2016

प्रकृति का विकास कैसे हुआ? कई विद्वानों की इस बाबत अलग-अलग धारणाएं हैं, लेकिन प्रकृति बदलाव की परिचायक है इस बाबत विद्वानों को न कोई शक है न शुबहा।प्रकृति के विकास के संदर्भ में भले ही अनेकों अवधारणाएं हों लेकिन जीवन के विकास के संदर्भ में आज भी केवल एक ही अवधारणा पूरे विश्व में मान्य है और वो अवधारणा जैसा कि तुम जानते ही हो 'चार्ल्स डार्विन' ने अपनी पुस्तक 'ON THE ORIGIN OF SPECIES' में उल्लेखित की है। खैर जीवन के विकास के साथ-साथ हर प्राणी में कई बदलाव भी आये और इन्हीं बदलावों के चलते कई नयी प्रजातियां भी जन्मीं और हम मनुष्य भी इन बदलावों से अछूते नहीं रहे। एक मनुष्य के जीवन काल में उसमें भी कई बदलाव आते हैं, कई चरण आते है और इन्हीं से होता है एक मनुष्य का विकास। मनुष्य के विकास की ये अवधारणा केवल रुपया-पैसा, गाड़ी-बंगला, ऐशो-आराम तक सीमित नहीं है, मनुष्य का असली विकास उसके व्यक्तित्व के विकास में होता है और इसके लिए किसी भी मनुष्य को किसी विशेष कक्षा लेने की जरुरत नहीं होती केवल कुछ छोटी-छोटी  बातों को ध्यान में रखकर भी तुम अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकते हो और में तुमको उन्हीं कुछ बातों के बारे में बताने वाला हूँ।

जैसा कि तुमको विदित होगा एक व्यक्तित्व को केवल चार चीजें ही सम्पूर्ण करतीं हैं जो कि आपस में 25-25 प्रतिशत मिलकर एक सम्पूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण करतीं हैं। जिनमें सबसे पहले पायदान पर होता है 'मानव मष्तिष्क', दूसरे पर 'मानव शरीर', तीसरे पर 'मानवीय संवेदनाएं और चौथे के बारे में मैं तुमको अंत में बताऊंगा। अगर हम इन चारों का विकास करें तो निश्चित ही एक सम्पूर्ण विकसित व्यक्तित्व को पा लेंगे। लेकिन कैसे? वही बता रहा हूँ।

1- मस्तिष्क को विकसित करने के लिए रोज या नियमित रूप से एक सुडोकू को पूरा करो अगर ये नहीं कर सकते हो तो अपने आस-पास की चीजों का जायजा लो और खुद से ही प्रश्न करो कि ऐसा क्यों और खुद ही अपने दिमाग से जवाब हासिल करो। इसके साथ कुछ पढ़ो और जरूरी नहीं कि जो पढ़ रहे हो उस पर पूर्णरूप से विश्वास कर लो।  जो पढ़ रहे हो अगर वो विश्वाश करने लायक है तो तो उस पर विश्वास करना अन्यथा उसे सत्य न मानते हुए सत्य को पहचानो। दिन में हो सके तो कुछ लिखो, चाहे एक लाइन ही लिखो लेकिन अपने दिमाग से उपजित लिखो। चाहो तो अपने भविष्य के सपने लिखो और नियमित अंतराल पर उनको पढ़ो और ज्ञान करो कि क्या पाया? मस्तिष्क के लिए इतना काफी है।

2- मानव शरीर इस दुनिया की सबसे जटिल मशीन है इतनी जटिल है कि मानव अपने चरम पर आकर भी अभी तक कोई कृत्रिम शरीर नहीं बना पाया। तुम, मैं और हम सब खुशकिस्मत हैं कि हमारी आत्मा इस जटिल मशीन के अंदर है। इस शरीर को विकसित करने का केवल एक ही उपाय है केवल 'भोजन'। खाना समय पर खाना, बाहर का मत खाना। तुम मजबूर होंगे बाहर का खाना खाने को लेकिन फ़ास्ट फ़ूड और रेडीमेड सॉफ्टड्रिंक्स से परहेज करना। हो सके तो नियमित रूप से मौसमी फलों का सेवन करो और रात को थोड़ा कम खाओ। व्यायाम और योग तुम्हारी इस मशीन की कार्यप्रणाली में इजाफा करेंगे इसलिए हो सके तो सुबह जल्दी उठ कर और बाहर जाकर 10 मिनट तक गहरी गहरी सांस लेकर पर्याप्त मात्रा में शुद्ध ऑक्सिजन अपने खून में प्रवाहित करवाओ और कुछ योग करो। व्यायाम अगर न कर सको तो कुछ काम खड़े रहकर करो और दिन में कम से कम 2 किमी पैदल चलो। जैसा कि कहते हैं कि 'स्वस्थ मन केवल स्वस्थ शरीर में ही निवास करता है।' अगर शरीर स्वस्थ नहीं तो सब बेकार है।

3-  तीसरी चीज है संवेदनाएं, जो कि हृदय से निकलती हैं। अब संवेदनाओं को विकसित करने का तरीका क्या हो? इसके लिए कुछ न करो बस अपने पसंदीदा गाने सुनो, फिल्म देखो, और समय मिले तो कभी एक दो घंटे बिना फ़ोन के एकांत में बैठो और सोचो कि क्या तुमने आज पूरे दिन किसी की मदद की? अगर नहीं की तो मदद करना सीखो। मदद और परहित तुम्हारी संवेदनाओं (imotions) को नयी ताज़गी देंगी। मदद का मतलब दान या भीख देना नहीं होता, ये भी साथ में ध्यान रखना।

4- बादबाकी जो चौथी चीज़ बची है वो है तुम्हारी आत्मा और आत्मा को विकसित करने का तरीका गीता में भी नहीं है। तुम केवल शुरू की इन तीन चीजों को विकसित करो आत्मा खुदबखुद विकसित हो जायेगी।

तुम सोच रहे होंगे कि आज मुझे क्या हुआ जो इतना लंबा और बोरिंग सा लेख लिख दिया। तो जबाब में बस इतना कहूँगा कि आज तुम्हारा जन्मदिन है और तुम बहुत दूर हो। भौतिक उपहार का कोई अस्तित्व नहीं होता इसलिए अपनी तरफ से तुम्हारे लिए स्पेशल लिखा है। मेरी तरफ से इसे अपने जन्मदिन का तोहफा समझना।
जन्मदिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।
हमेशा तरक्की के पथ पर अग्रसरित रहो।
हमेशा की भांति सबसे आखिर में।

©SunitSharma.

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