# darktales
"An Astrologer's Day"
Story by R. K. Narayan.
अनुवाद -: सुनीत शर्मा।
दोपहर को बिल्कुल ठीक समय पर उसने अपना झोला खोलकर अपने सारे व्यावसायिक ताम-झाम, जिनमें एक दर्जन सीपी, रहस्यमयी आकृतियों से चिता हुआ एक चौकोर कपडे का टुकड़ा, एक कॉपी, खजूर के पत्तों का गुच्छा जिस पर कुछ मंत्र लिखे हुए थे, निकाल कर बाहर बिखरा दिए। उसका माथा पवित्र भभूत और सिंदूर के लेप से चमक रहा था। उसकी आंखें एक असामान्य चमक से चमक रही थी। वास्तव में यह चमक लगातार अपने ग्राहकों को ढूंढते रहने के कारण उस की आंखों में बस गई थी। उसकी इस चमक को उसके ग्राहक एक दैवीय चमक समझते थे और राहत महसूस करते थे। उसकी आंखों की यह चमक उनकी स्थिति, जोकि उसके हुए माथे और गालों तक फैली घनी मूँछों के बिल्कुल बीच में आती थी, के कारण और बढ जाती थी। अपने प्रभाव को और ज्यादा बढ़ाने की लिए उसने अपने सर पर भगवा रंग की पगड़ी भी बांध रखी थी।
उसकी यह वेशभूषा आज तक कभी असफल नहीं हुई थी लोग उसकी तरफ ऐसे खिंचे चले आते थे जैसे रंगबिरंगे फूलों की तरफ मधुमक्खियां। उसका ठिकाना सेंट्रल हॉल की तरफ जाने वाले रास्ते के किनारे खड़े हुए एक विशालकाय इमली के पेड़ की घनी शाखाओं के नीचे था। यह जगह कई मायनों में मानीखेज थी; इस संकरे रास्ते पर भीड़ की लहर सुबह से शाम तक हमेशा आती जाती रहती थी। इस रास्ते पर पूरा दिन विभिन्न प्रकार के व्यापार और व्यवसाय चलते रहते थे जिनमें झोला छाप डॉक्टर, चोरी का पुराना सामान बेचने वाला कबाड़ी, जादूगर और इन सब का गुरु एक कपड़े बेचने वाला जोकि पूरा दिन तमाम शहर को आकर्षित करने के लिए चिल्लाता रहता था।
सबसे ज्यादा शोर उससे आगे खडा हुआ मूंगफली वाला करता था, जो कि अपने माल को हर दिन एक नया नाम देता था पहले दिन वह उसे "बॉम्बे आइसक्रीम" कहता था, दूसरे दिन "दिल्ली के बादाम", तीसरे दिन "राजसी भोजन" और चौथे दिन कुछ और, लेकिन भीड़ उसे हर समय घेरे रहती थी।
सड़क से गुजरती इस भीड़ का कुछ एक हिस्सा ज्योतिषी के सामने से भी गुजरता था। ज्योतिषी ने अपने व्यापार को एक मशाल की मद्धम सी रोशनी के तले सजा रखा था, जोकि पड़ोस के मूंगफली वाले के पास से आती थी। मुकम्मल माहौल का आधा जादू केवल इस वजह से बरकरार था कि यहां सरकार की तरफ से रोशनी का कोई इंतजाम नहीं था। यह जगह केवल दुकानों पर मौजूद रोशनी की वजह से ही जगमग-जगमग करती थी। एक-दो दुकानदार के पास गैस के हंडे थे, तो कुछ के पास खम्भों पर लटकी जलती हुई मशालें थी और कुछ के पास ढिबरियाँ थी। एक-दो जैसे कि हमारा ज्योतिषी अपना काम बिना रोशनी के भी चलाते थे। यह जगह मद्धम प्रकाश और चलती फिरती छायाओं से युक्त एक मायाजाल भर थी।
यह सारा माहौल ज्योतिषी के लिए एकदम माकूल था। अपनी जिंदगी की शुरुआत में वह इस पेशे में आना ही नहीं चाहता था, कहने को तो वो ज्योतिषी था लेकिन उसे इतना तक नहीं मालूम था कि अगले मिनट बाद उसके साथ क्या होने वाला था? सितारे, ग्रह और नक्षत्र उसके लिए उतने ही अजनबी थे जितना कि उसके ग्राहकों के लिए यद्यपि वो ऐसी बातें कहता था जो कि सुनने वाले के ह्रदय को प्रसन्नता और भौंचक्केपन से भर देती थीं। ऐसी बातें वह अपनी मनोवैज्ञानिक समझ, अभ्यास और तार्किक अनुमानों के आधार पर कहता था। कुल मिलाकर वो अपना काम पूरी ईमानदारी से करता था और वह उस मजदूरी का वास्तविक हकदार था जिसे वह हर रात अपने घर ले जाता था।
उसे बिना सोचे-विचारे अपना गांव छोड़ना पड़ा था। अगर वह वहां रहता तो उसे खेत जोतना, मक्के की बुवाई, शादी सरीखे अपने पुश्तैनी काम अपने पुरखों के घर में रहते हुए करने पड़ते। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ था, उसे गुपचुप तरीके से अपना घर छोड़ना पड़ा और जब तक वो अपने घर से 200 मील दूर नहीं आ गया था तब तक उसने एक क्षण भी आराम नहीं किया था। एक देहाती के मद्देनजर यह बहुत बड़ा काम था।
उसे इंसान की रोज़मर्रा की परेशानियों मसलन शादी, रुपया, और धर्मसंकटों का कार्यानुगत विश्लेषण प्राप्त था। लंबे अभ्यास से उसकी पूर्वानुमान लगाने की कला में भी इज़ाफा हुआ था। केवल 5 मिनट के अंदर ही उसकी समझ में आ जाता था कि सामने वाले के साथ क्या गलत था। वह हर प्रश्न के ₹30 लेता था और तब तक अपना मुंह नहीं खोलता था जब तक कि सामने वाला कम से कम 10 मिनट तक बोल नहीं चुका हो। इससे उसे दर्जनों जवाबों और सलाहों के लिए मसाला मिल चुका होता था। वह जब लोगों की हथेली देखकर बताता, "तुम्हें अपने प्रयासों से मनवांछित परिणाम नहीं मिल पा रहे है" तो 10 में से 9 लोगों को उसकी बात से सहमत होना ही पड़ता था। या जब पूछता "क्या तुम्हारे परिवार, रिश्तेदारी या पहचान की कोई औरत है जो कि तुम पर आजकल अच्छी तरह से ध्यान नहीं दे रही?" या जब वो उनके चरित्र का विश्लेषण करता "तुम्हारी सारी परेशानियों की वजह तुम्हारा स्वभाव है तुम्हें इस पर ध्यान देना होगा क्योंकि तुम पर शनि की छाया है और तुम्हारा स्वभाव गुस्सैल है।" यह कथन श्रोता के हृदय को तुरंत प्रसन्नता से भर देते थे क्योंकि दुनिया का सबसे ज्यादा विनम्र इंसान भी गुस्सा होना पसंद करता है।
आज उसका दिन अच्छा नहीं गुजरा था, उसके पास एक भी ग्राहक नहीं आया था। रात भी काफी हो चुकी थी मूँगफली वाले ने अपनी मशाल बुझाई और घर जाने के लिए उठा। ज्योतिषी के लिए भी यह अपना सामान बांधने का संकेत था। क्योंकि दूर कहीं से आते एक हरे प्रकाश के अलावा वहां कोई रोशनी नहीं थी, अब वहाँ काफी अंधेरा हो चुका था। उसने अपनी सीपियां और अपना तमाम साजोसामान समेटा और अपने झोले में डालने लगा तभी यकायक हरे प्रकाश में धुंधलापन आया उसने नजर उठाकर देखा तो अपने सामने एक आदमी को खड़ा हुआ पाया। भावी ग्राहक का एहसास होते ही वह उस आदमी से बोला "तुम काफी थके हुए लगते हो अगर तुम यहां मेरे सामने बैठकर मुझसे बातें करोगे तो तुम्हें अच्छा लगेगा।" ग्राहक ने कुछ अस्पष्ट सा उत्तर दिया, उसने बैठकर उसकी नाक के आगे हथेली खोल दी और बोला "तो तुम अपने आप को नजूमी कहते हो।" ज्योतिषी ने तुरंत चुनौती को स्वीकार किया और उसकी हथेली को हरे प्रकाश की तरफ करते हुए बोला, "तुम्हारा स्वभाव......."
"भाड़ में गया मेरा स्वभाव...... बकवास बंद करो..... और कुछ ढ़ंग का बताओ।" ग्राहक ने गुस्से से कहा।
ज्योतिषी को अपमान महसूस हुआ। "सुनो मैं एक प्रश्न के ₹30 लेता हूँ और ₹30 के हिसाब से तुमको केवल यही मिल पाएगा।"
ऐसा सुनकर ग्राहक ने जेब में हाथ डाल कर पाँचसौ का नोट निकाला, उसकी तरफ फेंका और बोला "मुझे कुछ प्रश्नों का जवाब चाहिए और यदि मुझको लगा कि तुम मुझे बाकी ग्राहकों की मानिंद मूर्ख बना रहे हो तो तुमको यह 500 रुपए सूद सहित लौटाने पड़ेंगे।"
"अगर मेरे उत्तर सही निकले तो क्या तुम मुझको ₹2000 दोगे।"
"नहीं।"
"तो चलो एक हजार रुपए देना।"
"ठीक है, लेकिन यदि तुम गलत निकले तो तुम्हारे सारे रुपए मेरे।" ग्राहक ने कहा।
एक छोटे से मोलभाव के बाद सौदा आखिरकार 1000 में पटा। ज्योतिषी ने अपने इष्ट देवों की प्रार्थना की और इतनी देर में ग्राहक ने एक सिगरेट सुलगाई। माचिस की रोशनी में ज्योतिषी को ग्राहक चेहरे की एक झलक दिखाई दी, मक्कारी उसके चेहरे से टपक रही थी। कुछ पलों तक उन दोनों के बीच एक अजीब सी ख़ामोशी छाई रही क्योंकि माहौल में एक साथ कारों के हॉर्न, तांगे वालों की अपने घोड़ों पर पड़ने वाली दुत्कारों, उस अन्धकार से घर जाने वाली भीड़ का कोलाहल और शोर बढ़ चुका था। ग्राहक ने अपनी सिगरेट का एक कश खींचा, धुआँ बाहर निकाला और बेचैनी से बैठा रहा। ग्राहक के धूर्त व्यवहार से ज्योतिषी खुद को असहज महसूस कर रहा था। "यह लो अपने पाँचसौ रूपये वापस। मैं ऐसी चुनौतियों को स्वीकार नहीं करता और मुझे देर भी हो चुकी है।" इतना कहकर ज्योतिषी ने अपना सामान समेटना फिर शुरू कर दिया।
ग्राहक ने उसकी गर्दन दबोच ली और बोला, "अब तुम ऐसे नहीं जा सकते, मैं तो यहाँ से जा रहा था तुमने ही मुझे इस सब में घसीटा है"।
ज्योतिषी उसकी पकड़ में कपकंपा रहा था, अपनी लढ़खड़ाती और धीमी आवाज़ में उसने कहा, " मुझे आज जाने दो मैं कल तुम्हारे सारे सवालों के जवाब दे दूँगा।"
ग्राहक ने उसके जबड़े को दबोचा और कहा, "चुनौती चुनौती होती है। मेरे बारे में बताओ।"
ज्योतिषी ने अपने सूखे हुए गले से कहना शुरू किया, "तुम्हारे परिवार, रिश्तेदारी और पहचान में एक औरत....."
ज्योतिषी के अगले शब्द ग्राहक के थप्पड़ की वजह से उसके हलक में ही रह गए। "मुझे फालतू की बकवास नहीं चाहिए, मुझे बस इतना बताओ कि क्या मुझे मेरी मौजूदा तलाश में सफलता मिलेगी और घर जाओ। अन्यथा मैं तुम्हें तब तक घर नहीं जाने दूंगा जब तक कि तुम्हारे सारे रूपये न निकलवा लूँ।"
मदद की कहीं कोई उम्मीद नहीं थी। ज्योतिषी ने उसे पीछे की ओर धकेला, कुछ मन्त्र बुदबुदाये और बोला, "ठीक है अब मैं तुम्हारी जिज्ञासाओं को शांत करूंगा और अगर मेरे जवाबों से तुम संतुष्ट हो जाओ तो मुझे 2500 रूपये देने का वायदा करो अन्यथा मैं अपना मुँह नहीं खोलूँगा और तुमको जो करना हो वो कर लो।"
काफी हील-हुज्जत के बाद ग्राहक राजी हो गया।
ज्योतिषी ने कहा, "तुमको मरने के लिए छोड़ दिया गया था। सही है?"
"बिलकुल सही, मुझे और बताओ।"
"तुम्हारी छाती में एक बार खंजर घौंपा गया था।"
"हाँ, बहुत खूब!" ग्राहक ने अपनी छाती खोलकर निशान दिखाया। "यहाँ घौंपा था...फिर?"
"फिर तुमको मरने के लिए नजदीकी कुंए में धकेल दिया गया था।"
"मैं मर ही जाता अगर एक मुसाफिर कूंए में नहीं झांकता तो।" ग्राहक ने एक अजब सी भाव-भंगिमा में जवाब दिया।"वो मुझे कब मिलेगा?" उसने मुट्ठियाँ भींचते हुए दुबारा पूछा।
"अगले जन्म में", ज्योतिषी ने जवाब दिया, "चार महीने पहले वो एक सुदूर शहर में काल-कवलित हो चुका है। तुम अब उससे कभी नहीं मिल पाओगे, गुरुनायक।"
"तुम मेरा नाम भी जान गए!"
"तुम्हारे मस्तिष्क की रेखाएं मुझे तुम्हारे बारे में सब बता रहीं हैं। गुरुनायक, जो मैं कह रहा हूँ उसे ध्यान से सुनो। तुम्हारा घर यहाँ से 200 मील दूर उत्तर में है, अगली ट्रेन पकड़ो और सीधे घर जाओ। मुझे तुम्हारे सर पर एक गंभीर खतरा मंडराता हुआ महसूस हो रहा है।" ज्योतिषी ने एक चुटकी पवित्र राख और एक ताबीज ग्राहक को देते हुए कहा, "इस भभूत को अपने माथे पर लगाओ, ताबीज़ पहनो और सीधे घर जाओ। दुबारा कभी दक्षिण की तरफ यात्रा मत करना इससे तुम सौ साल जीओगे।"
"मैं अब घर क्यों छोड़ूंगा?" ग्राहक ने तुरंत जवाब दिया। "इतने दिनों से मैं केवल उसकी तलाश में था ताकि वह मुझे मिले और मैं उसका काम तमाम कर सकूं। लेकिन वह मेरे हाथों से बच निकला। शायद उसकी मृत्यु भयानक रही होगी!"
"हां।" ज्योतिषी ने जवाब दिया। "वह एक ट्रक के नीचे कुचल कर उसका कीमा बन गया था।" ग्राहक यह शब्द सुनकर कृतार्थ हो गया था।
कुछ समय बाद वह जगह वीरान हो चुकी थी। ज्योतिषी ने अपना सारा सामान समेटा और अपने झोले में डाल लिया। हरा प्रकाश भी कहीं लुप्त हो चुका था। अब उस जगह एक अजीब सा सन्नाटा और अंधकार छाया हुआ था, अजनबी ग्राहक भी रात के अंधेरे में, ज्योतिषी को एक मुठ्ठी नोट थमाकर, विलीन हो गया था।
जब ज्योतिषी अपने घर पहुंचा तो आधी रात हो चुकी थी और उसकी बीवी दरवाजे पर जवाब मांगने वाली मुद्रा में खड़ी हुई थी। ज्योतिषी ने उसके हाथ में रुपए थमाये और कहा, "इन्हें गिनो, एक ग्राहक ने यह सारे रुपए दिए है।"
"साढ़े तीन हज़ार रुपये।" वह ख़ुशी से चहकते हुए बोली। वह अत्यधिक खुश थी। "अब कल मैं बच्चों के लिए कुछ मिठाई और फल आदि खरीदूँगी। बच्चे काफी दिन से बाजार का खाना खाने की कह रहे थे और कल मैं उनके लिए कुछ अच्छा खाना पकाऊंगी।"
"तुम कुछ चिंता सी में दिख रहे हो?"उसने पूछा।
"कुछ नहीं।" तुम बस खाना लगाओ।
खाने के बाद, चारपाई पर बैठते हुए ज्योतिषी ने अपनी बीवी को बताया, "क्या तुमको पता है कि आज मेरे सीने पर रखा हुआ एक बोझ उतर गया। इतने सालों तक मैं सोचता रहा, मेरे हाथ एक आदमी के खून से रंगे हैं। इसी वजह से मुझे अपना घर छोड़ना पड़ा, यहां अपना ठिकाना बनाना पड़ा और तुमसे शादी की। लेकिन वह आदमी जिंदा है।"
"तुमने एक आदमी की हत्या का प्रयास किया था!" वह हाँफती हुई बोली।
"हाँ, हमारे गाँव में, तब हम नासमझ थे.... ताज़ा हुए जवान थे। हमने साथ शराब पी, जुआ खेला, अपने 2500 रूपये वसूलने को लेकर हममें झगड़ा हो गया था और मैंने उसकी छाती में खंजर उतार दिया था। मेरे रूपये आज वसूल हो गए वो भी सूद सहित। खैर अब उन बातों का क्या सोचना? अब नींद आ रही है।" उसने एक जम्हाई ली और अंगड़ाता हुआ चारपाई पर पसर गया।
आज ज्योतिषी का दिन था।
# translation4u
"An Astrologer's Day"
Story by R. K. Narayan.
अनुवाद -: सुनीत शर्मा।
दोपहर को बिल्कुल ठीक समय पर उसने अपना झोला खोलकर अपने सारे व्यावसायिक ताम-झाम, जिनमें एक दर्जन सीपी, रहस्यमयी आकृतियों से चिता हुआ एक चौकोर कपडे का टुकड़ा, एक कॉपी, खजूर के पत्तों का गुच्छा जिस पर कुछ मंत्र लिखे हुए थे, निकाल कर बाहर बिखरा दिए। उसका माथा पवित्र भभूत और सिंदूर के लेप से चमक रहा था। उसकी आंखें एक असामान्य चमक से चमक रही थी। वास्तव में यह चमक लगातार अपने ग्राहकों को ढूंढते रहने के कारण उस की आंखों में बस गई थी। उसकी इस चमक को उसके ग्राहक एक दैवीय चमक समझते थे और राहत महसूस करते थे। उसकी आंखों की यह चमक उनकी स्थिति, जोकि उसके हुए माथे और गालों तक फैली घनी मूँछों के बिल्कुल बीच में आती थी, के कारण और बढ जाती थी। अपने प्रभाव को और ज्यादा बढ़ाने की लिए उसने अपने सर पर भगवा रंग की पगड़ी भी बांध रखी थी।
उसकी यह वेशभूषा आज तक कभी असफल नहीं हुई थी लोग उसकी तरफ ऐसे खिंचे चले आते थे जैसे रंगबिरंगे फूलों की तरफ मधुमक्खियां। उसका ठिकाना सेंट्रल हॉल की तरफ जाने वाले रास्ते के किनारे खड़े हुए एक विशालकाय इमली के पेड़ की घनी शाखाओं के नीचे था। यह जगह कई मायनों में मानीखेज थी; इस संकरे रास्ते पर भीड़ की लहर सुबह से शाम तक हमेशा आती जाती रहती थी। इस रास्ते पर पूरा दिन विभिन्न प्रकार के व्यापार और व्यवसाय चलते रहते थे जिनमें झोला छाप डॉक्टर, चोरी का पुराना सामान बेचने वाला कबाड़ी, जादूगर और इन सब का गुरु एक कपड़े बेचने वाला जोकि पूरा दिन तमाम शहर को आकर्षित करने के लिए चिल्लाता रहता था।
सबसे ज्यादा शोर उससे आगे खडा हुआ मूंगफली वाला करता था, जो कि अपने माल को हर दिन एक नया नाम देता था पहले दिन वह उसे "बॉम्बे आइसक्रीम" कहता था, दूसरे दिन "दिल्ली के बादाम", तीसरे दिन "राजसी भोजन" और चौथे दिन कुछ और, लेकिन भीड़ उसे हर समय घेरे रहती थी।
सड़क से गुजरती इस भीड़ का कुछ एक हिस्सा ज्योतिषी के सामने से भी गुजरता था। ज्योतिषी ने अपने व्यापार को एक मशाल की मद्धम सी रोशनी के तले सजा रखा था, जोकि पड़ोस के मूंगफली वाले के पास से आती थी। मुकम्मल माहौल का आधा जादू केवल इस वजह से बरकरार था कि यहां सरकार की तरफ से रोशनी का कोई इंतजाम नहीं था। यह जगह केवल दुकानों पर मौजूद रोशनी की वजह से ही जगमग-जगमग करती थी। एक-दो दुकानदार के पास गैस के हंडे थे, तो कुछ के पास खम्भों पर लटकी जलती हुई मशालें थी और कुछ के पास ढिबरियाँ थी। एक-दो जैसे कि हमारा ज्योतिषी अपना काम बिना रोशनी के भी चलाते थे। यह जगह मद्धम प्रकाश और चलती फिरती छायाओं से युक्त एक मायाजाल भर थी।
यह सारा माहौल ज्योतिषी के लिए एकदम माकूल था। अपनी जिंदगी की शुरुआत में वह इस पेशे में आना ही नहीं चाहता था, कहने को तो वो ज्योतिषी था लेकिन उसे इतना तक नहीं मालूम था कि अगले मिनट बाद उसके साथ क्या होने वाला था? सितारे, ग्रह और नक्षत्र उसके लिए उतने ही अजनबी थे जितना कि उसके ग्राहकों के लिए यद्यपि वो ऐसी बातें कहता था जो कि सुनने वाले के ह्रदय को प्रसन्नता और भौंचक्केपन से भर देती थीं। ऐसी बातें वह अपनी मनोवैज्ञानिक समझ, अभ्यास और तार्किक अनुमानों के आधार पर कहता था। कुल मिलाकर वो अपना काम पूरी ईमानदारी से करता था और वह उस मजदूरी का वास्तविक हकदार था जिसे वह हर रात अपने घर ले जाता था।
उसे बिना सोचे-विचारे अपना गांव छोड़ना पड़ा था। अगर वह वहां रहता तो उसे खेत जोतना, मक्के की बुवाई, शादी सरीखे अपने पुश्तैनी काम अपने पुरखों के घर में रहते हुए करने पड़ते। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ था, उसे गुपचुप तरीके से अपना घर छोड़ना पड़ा और जब तक वो अपने घर से 200 मील दूर नहीं आ गया था तब तक उसने एक क्षण भी आराम नहीं किया था। एक देहाती के मद्देनजर यह बहुत बड़ा काम था।
उसे इंसान की रोज़मर्रा की परेशानियों मसलन शादी, रुपया, और धर्मसंकटों का कार्यानुगत विश्लेषण प्राप्त था। लंबे अभ्यास से उसकी पूर्वानुमान लगाने की कला में भी इज़ाफा हुआ था। केवल 5 मिनट के अंदर ही उसकी समझ में आ जाता था कि सामने वाले के साथ क्या गलत था। वह हर प्रश्न के ₹30 लेता था और तब तक अपना मुंह नहीं खोलता था जब तक कि सामने वाला कम से कम 10 मिनट तक बोल नहीं चुका हो। इससे उसे दर्जनों जवाबों और सलाहों के लिए मसाला मिल चुका होता था। वह जब लोगों की हथेली देखकर बताता, "तुम्हें अपने प्रयासों से मनवांछित परिणाम नहीं मिल पा रहे है" तो 10 में से 9 लोगों को उसकी बात से सहमत होना ही पड़ता था। या जब पूछता "क्या तुम्हारे परिवार, रिश्तेदारी या पहचान की कोई औरत है जो कि तुम पर आजकल अच्छी तरह से ध्यान नहीं दे रही?" या जब वो उनके चरित्र का विश्लेषण करता "तुम्हारी सारी परेशानियों की वजह तुम्हारा स्वभाव है तुम्हें इस पर ध्यान देना होगा क्योंकि तुम पर शनि की छाया है और तुम्हारा स्वभाव गुस्सैल है।" यह कथन श्रोता के हृदय को तुरंत प्रसन्नता से भर देते थे क्योंकि दुनिया का सबसे ज्यादा विनम्र इंसान भी गुस्सा होना पसंद करता है।
आज उसका दिन अच्छा नहीं गुजरा था, उसके पास एक भी ग्राहक नहीं आया था। रात भी काफी हो चुकी थी मूँगफली वाले ने अपनी मशाल बुझाई और घर जाने के लिए उठा। ज्योतिषी के लिए भी यह अपना सामान बांधने का संकेत था। क्योंकि दूर कहीं से आते एक हरे प्रकाश के अलावा वहां कोई रोशनी नहीं थी, अब वहाँ काफी अंधेरा हो चुका था। उसने अपनी सीपियां और अपना तमाम साजोसामान समेटा और अपने झोले में डालने लगा तभी यकायक हरे प्रकाश में धुंधलापन आया उसने नजर उठाकर देखा तो अपने सामने एक आदमी को खड़ा हुआ पाया। भावी ग्राहक का एहसास होते ही वह उस आदमी से बोला "तुम काफी थके हुए लगते हो अगर तुम यहां मेरे सामने बैठकर मुझसे बातें करोगे तो तुम्हें अच्छा लगेगा।" ग्राहक ने कुछ अस्पष्ट सा उत्तर दिया, उसने बैठकर उसकी नाक के आगे हथेली खोल दी और बोला "तो तुम अपने आप को नजूमी कहते हो।" ज्योतिषी ने तुरंत चुनौती को स्वीकार किया और उसकी हथेली को हरे प्रकाश की तरफ करते हुए बोला, "तुम्हारा स्वभाव......."
"भाड़ में गया मेरा स्वभाव...... बकवास बंद करो..... और कुछ ढ़ंग का बताओ।" ग्राहक ने गुस्से से कहा।
ज्योतिषी को अपमान महसूस हुआ। "सुनो मैं एक प्रश्न के ₹30 लेता हूँ और ₹30 के हिसाब से तुमको केवल यही मिल पाएगा।"
ऐसा सुनकर ग्राहक ने जेब में हाथ डाल कर पाँचसौ का नोट निकाला, उसकी तरफ फेंका और बोला "मुझे कुछ प्रश्नों का जवाब चाहिए और यदि मुझको लगा कि तुम मुझे बाकी ग्राहकों की मानिंद मूर्ख बना रहे हो तो तुमको यह 500 रुपए सूद सहित लौटाने पड़ेंगे।"
"अगर मेरे उत्तर सही निकले तो क्या तुम मुझको ₹2000 दोगे।"
"नहीं।"
"तो चलो एक हजार रुपए देना।"
"ठीक है, लेकिन यदि तुम गलत निकले तो तुम्हारे सारे रुपए मेरे।" ग्राहक ने कहा।
एक छोटे से मोलभाव के बाद सौदा आखिरकार 1000 में पटा। ज्योतिषी ने अपने इष्ट देवों की प्रार्थना की और इतनी देर में ग्राहक ने एक सिगरेट सुलगाई। माचिस की रोशनी में ज्योतिषी को ग्राहक चेहरे की एक झलक दिखाई दी, मक्कारी उसके चेहरे से टपक रही थी। कुछ पलों तक उन दोनों के बीच एक अजीब सी ख़ामोशी छाई रही क्योंकि माहौल में एक साथ कारों के हॉर्न, तांगे वालों की अपने घोड़ों पर पड़ने वाली दुत्कारों, उस अन्धकार से घर जाने वाली भीड़ का कोलाहल और शोर बढ़ चुका था। ग्राहक ने अपनी सिगरेट का एक कश खींचा, धुआँ बाहर निकाला और बेचैनी से बैठा रहा। ग्राहक के धूर्त व्यवहार से ज्योतिषी खुद को असहज महसूस कर रहा था। "यह लो अपने पाँचसौ रूपये वापस। मैं ऐसी चुनौतियों को स्वीकार नहीं करता और मुझे देर भी हो चुकी है।" इतना कहकर ज्योतिषी ने अपना सामान समेटना फिर शुरू कर दिया।
ग्राहक ने उसकी गर्दन दबोच ली और बोला, "अब तुम ऐसे नहीं जा सकते, मैं तो यहाँ से जा रहा था तुमने ही मुझे इस सब में घसीटा है"।
ज्योतिषी उसकी पकड़ में कपकंपा रहा था, अपनी लढ़खड़ाती और धीमी आवाज़ में उसने कहा, " मुझे आज जाने दो मैं कल तुम्हारे सारे सवालों के जवाब दे दूँगा।"
ग्राहक ने उसके जबड़े को दबोचा और कहा, "चुनौती चुनौती होती है। मेरे बारे में बताओ।"
ज्योतिषी ने अपने सूखे हुए गले से कहना शुरू किया, "तुम्हारे परिवार, रिश्तेदारी और पहचान में एक औरत....."
ज्योतिषी के अगले शब्द ग्राहक के थप्पड़ की वजह से उसके हलक में ही रह गए। "मुझे फालतू की बकवास नहीं चाहिए, मुझे बस इतना बताओ कि क्या मुझे मेरी मौजूदा तलाश में सफलता मिलेगी और घर जाओ। अन्यथा मैं तुम्हें तब तक घर नहीं जाने दूंगा जब तक कि तुम्हारे सारे रूपये न निकलवा लूँ।"
मदद की कहीं कोई उम्मीद नहीं थी। ज्योतिषी ने उसे पीछे की ओर धकेला, कुछ मन्त्र बुदबुदाये और बोला, "ठीक है अब मैं तुम्हारी जिज्ञासाओं को शांत करूंगा और अगर मेरे जवाबों से तुम संतुष्ट हो जाओ तो मुझे 2500 रूपये देने का वायदा करो अन्यथा मैं अपना मुँह नहीं खोलूँगा और तुमको जो करना हो वो कर लो।"
काफी हील-हुज्जत के बाद ग्राहक राजी हो गया।
ज्योतिषी ने कहा, "तुमको मरने के लिए छोड़ दिया गया था। सही है?"
"बिलकुल सही, मुझे और बताओ।"
"तुम्हारी छाती में एक बार खंजर घौंपा गया था।"
"हाँ, बहुत खूब!" ग्राहक ने अपनी छाती खोलकर निशान दिखाया। "यहाँ घौंपा था...फिर?"
"फिर तुमको मरने के लिए नजदीकी कुंए में धकेल दिया गया था।"
"मैं मर ही जाता अगर एक मुसाफिर कूंए में नहीं झांकता तो।" ग्राहक ने एक अजब सी भाव-भंगिमा में जवाब दिया।"वो मुझे कब मिलेगा?" उसने मुट्ठियाँ भींचते हुए दुबारा पूछा।
"अगले जन्म में", ज्योतिषी ने जवाब दिया, "चार महीने पहले वो एक सुदूर शहर में काल-कवलित हो चुका है। तुम अब उससे कभी नहीं मिल पाओगे, गुरुनायक।"
"तुम मेरा नाम भी जान गए!"
"तुम्हारे मस्तिष्क की रेखाएं मुझे तुम्हारे बारे में सब बता रहीं हैं। गुरुनायक, जो मैं कह रहा हूँ उसे ध्यान से सुनो। तुम्हारा घर यहाँ से 200 मील दूर उत्तर में है, अगली ट्रेन पकड़ो और सीधे घर जाओ। मुझे तुम्हारे सर पर एक गंभीर खतरा मंडराता हुआ महसूस हो रहा है।" ज्योतिषी ने एक चुटकी पवित्र राख और एक ताबीज ग्राहक को देते हुए कहा, "इस भभूत को अपने माथे पर लगाओ, ताबीज़ पहनो और सीधे घर जाओ। दुबारा कभी दक्षिण की तरफ यात्रा मत करना इससे तुम सौ साल जीओगे।"
"मैं अब घर क्यों छोड़ूंगा?" ग्राहक ने तुरंत जवाब दिया। "इतने दिनों से मैं केवल उसकी तलाश में था ताकि वह मुझे मिले और मैं उसका काम तमाम कर सकूं। लेकिन वह मेरे हाथों से बच निकला। शायद उसकी मृत्यु भयानक रही होगी!"
"हां।" ज्योतिषी ने जवाब दिया। "वह एक ट्रक के नीचे कुचल कर उसका कीमा बन गया था।" ग्राहक यह शब्द सुनकर कृतार्थ हो गया था।
कुछ समय बाद वह जगह वीरान हो चुकी थी। ज्योतिषी ने अपना सारा सामान समेटा और अपने झोले में डाल लिया। हरा प्रकाश भी कहीं लुप्त हो चुका था। अब उस जगह एक अजीब सा सन्नाटा और अंधकार छाया हुआ था, अजनबी ग्राहक भी रात के अंधेरे में, ज्योतिषी को एक मुठ्ठी नोट थमाकर, विलीन हो गया था।
जब ज्योतिषी अपने घर पहुंचा तो आधी रात हो चुकी थी और उसकी बीवी दरवाजे पर जवाब मांगने वाली मुद्रा में खड़ी हुई थी। ज्योतिषी ने उसके हाथ में रुपए थमाये और कहा, "इन्हें गिनो, एक ग्राहक ने यह सारे रुपए दिए है।"
"साढ़े तीन हज़ार रुपये।" वह ख़ुशी से चहकते हुए बोली। वह अत्यधिक खुश थी। "अब कल मैं बच्चों के लिए कुछ मिठाई और फल आदि खरीदूँगी। बच्चे काफी दिन से बाजार का खाना खाने की कह रहे थे और कल मैं उनके लिए कुछ अच्छा खाना पकाऊंगी।"
"तुम कुछ चिंता सी में दिख रहे हो?"उसने पूछा।
"कुछ नहीं।" तुम बस खाना लगाओ।
खाने के बाद, चारपाई पर बैठते हुए ज्योतिषी ने अपनी बीवी को बताया, "क्या तुमको पता है कि आज मेरे सीने पर रखा हुआ एक बोझ उतर गया। इतने सालों तक मैं सोचता रहा, मेरे हाथ एक आदमी के खून से रंगे हैं। इसी वजह से मुझे अपना घर छोड़ना पड़ा, यहां अपना ठिकाना बनाना पड़ा और तुमसे शादी की। लेकिन वह आदमी जिंदा है।"
"तुमने एक आदमी की हत्या का प्रयास किया था!" वह हाँफती हुई बोली।
"हाँ, हमारे गाँव में, तब हम नासमझ थे.... ताज़ा हुए जवान थे। हमने साथ शराब पी, जुआ खेला, अपने 2500 रूपये वसूलने को लेकर हममें झगड़ा हो गया था और मैंने उसकी छाती में खंजर उतार दिया था। मेरे रूपये आज वसूल हो गए वो भी सूद सहित। खैर अब उन बातों का क्या सोचना? अब नींद आ रही है।" उसने एक जम्हाई ली और अंगड़ाता हुआ चारपाई पर पसर गया।
आज ज्योतिषी का दिन था।
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To guruji jyotsi ne use phle hi phchan liya tha ya baad m
ReplyDeleteबहुत खूब....
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