#ट्रिक 4।
जिंदगी भी अजीब है कई नए तजुर्बे दे जाती है और मेरा मानना है कि तजुर्बा या ज्ञान जहाँ से मिले वहाँ से तुरंत हासिल कर लो। खैर आज मेरी शरीकेहयात यानि धर्मपत्नी जी को कुछ शॉपिंग करनी थी तो शाम को बाइक पर हम दोनों सीधे कोमल काम्प्लेक्स पहुँचे, वहाँ वो अपनी जरूरत का सामान छांट रहीं थीं कि अचानक वहाँ पर एक धनाढ्य महिला का आगमन हुआ उनके साथ उनका ड्राइवर भी था । उनके परिवार का शुमार हमारे शहर की जानी मानी हस्तियों में है। मैंने उनको नमस्ते किया क्योंकि उनको मैं व्यक़्क्तिगत तौर पर जानता था, उनके दोनों बेटों को मैंने लगातार पाँच साल पढ़ाया था जो कि आज बाहर कहीं कोचिंग कर रहे हैं। खैर उनसे तीन साल बाद मुलाकात हुई थी तो उन्होंने हमारी शरीकेहयात से भी औपचारिक बात की क्योंकि वो कुछ जल्दी में थीं। इधर हमारी धर्मपत्नी जी डिब्बे पर डिब्बे निकलवा रहीं थी और उधर भाभीजी ने जल्दी से एक सफ़ेद शर्ट और सफ़ेद पैंट छांटी जो कि मैं समझ गया कि उन्होंने अपने ड्राइवर के लिए खरीदी है। उन्होंने बिल की बाबत पूछा तो दुकानदार ने उनको सारे डिस्काउंट लगाकर ₹1800 का बिल बताया। वो एक क्षण को ठिठकी और कुछ सोचा, फिर अपने ड्राइवर के कान में कुछ कहा तो ड्राइवर ने अपनी जेब से उनको तीनसौ रूपये निकाल कर दिए और उन्होंने अपने पर्स से ₹1500 निकाल कर बिल चुकता किया, मुझे घर आने का निमंत्रण भी दिया और अपनी जल्दी जाने की मजबूरी बताकर वहाँ से चली गईं। मेरी धर्मपत्नी जी इन सारी बातों पर गौर कर रहीं थीं।
जब हम दोनों सारी खरीददारी करके घर आये तो मेरी धर्मपत्नी जी ने कहा कि "तुम तो कहते थे कि ये भाभीजी बहुत समझदार हैं, पैसे वाली है, और दरियादिल भी हैं। लेकिन आज अपने ड्राइवर से तीनसौ रूपये उधार लिए उन्होंने। कम से कम घर से इतने रूपये तो लेकर चलने चाहिए कि किसी से माँगने की नौबत न आये।"
जवाब में मैंने कहा कि "वो चाहतीं तो उसी वक्त अपने डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड या अपने एक वाक्य से पूरी की पूरी दुकान खरीद सकतीं थीं। लेकिन ड्राइवर से तीनसौ रूपये माँगने के पीछे भी उनका एक लॉजिक था।"
"कैसा लॉजिक? भला कोई इतना अमीर होते हुए भी ड्राइवर से तीनसौ रूपये उधार माँगता है?" हमारी धर्मपत्नीजी अपना ख़रीदा हुआ सामान देखते हुए बोलीं, क्योंकि सारा पेमेंट उन्होंने ही किया था बिना मुझसे माँगे।
तब मैंने उनको बताया कि "अगर वो उस ड्रैस की पूरी कीमत खुद चुकातीं तो ड्राइवर के लिए वो एक फ्री की पोशाक होती और वो उसका कभी ख्याल नहीं रखता। लेकिन जब उसी पोशाक में उसके तीनसौ रूपये मिले हुए हैं तो वो उसका ख्याल रखेगा, हर दम रखेगा।"
मेरी शरीकेहयात मेरे इस जवाब से लाजवाब हो गईं और जब उन्होंने मुझसे पूछा कि तुम कैसे जानते हो ये बात ? जवाब में मैने केवल इतना कहा कि वो नीला ब्लेजर जिसको तुम मेरे जन्मदिन पर गिफ्ट बतौर खरीद कर लाईं थी उसको तुमने कभी घर पर नहीं धोया बल्कि बादबाकी तीन ब्लेजर जो मैंने ख़रीदे थे उनको तुम घर पर धो देती हो।
उन भाभीजी की हरकत की बाबत ये केवल मेरा अंदाजा है जो कि गलत नहीं हो सकता। इससे मैंने एक सीख और सीखी है कि जब भी मैं अपने बेटे को कोई खिलौना दिलवाऊंगा तो कुछ रूपये उसकी गुल्लक से निकाल कर दिलवाऊंगा, और बाद में उतने ही रूपये उसकी गुल्लक में डाल दूंगा। ताकि उसे अपने रुपयों की कीमत आज से ही पता चले। आप भी ऐसा कर सकते हो, इससे खिलौनों के टूटने की गति में थोड़ा ठहराव आएगा।
बादबाकी बड़े बूढ़े कहते हैं कि रूपये पर अनुभव भारी होता है तो सही ही कहते होंगे।
जिंदगी भी अजीब है कई नए तजुर्बे दे जाती है और मेरा मानना है कि तजुर्बा या ज्ञान जहाँ से मिले वहाँ से तुरंत हासिल कर लो। खैर आज मेरी शरीकेहयात यानि धर्मपत्नी जी को कुछ शॉपिंग करनी थी तो शाम को बाइक पर हम दोनों सीधे कोमल काम्प्लेक्स पहुँचे, वहाँ वो अपनी जरूरत का सामान छांट रहीं थीं कि अचानक वहाँ पर एक धनाढ्य महिला का आगमन हुआ उनके साथ उनका ड्राइवर भी था । उनके परिवार का शुमार हमारे शहर की जानी मानी हस्तियों में है। मैंने उनको नमस्ते किया क्योंकि उनको मैं व्यक़्क्तिगत तौर पर जानता था, उनके दोनों बेटों को मैंने लगातार पाँच साल पढ़ाया था जो कि आज बाहर कहीं कोचिंग कर रहे हैं। खैर उनसे तीन साल बाद मुलाकात हुई थी तो उन्होंने हमारी शरीकेहयात से भी औपचारिक बात की क्योंकि वो कुछ जल्दी में थीं। इधर हमारी धर्मपत्नी जी डिब्बे पर डिब्बे निकलवा रहीं थी और उधर भाभीजी ने जल्दी से एक सफ़ेद शर्ट और सफ़ेद पैंट छांटी जो कि मैं समझ गया कि उन्होंने अपने ड्राइवर के लिए खरीदी है। उन्होंने बिल की बाबत पूछा तो दुकानदार ने उनको सारे डिस्काउंट लगाकर ₹1800 का बिल बताया। वो एक क्षण को ठिठकी और कुछ सोचा, फिर अपने ड्राइवर के कान में कुछ कहा तो ड्राइवर ने अपनी जेब से उनको तीनसौ रूपये निकाल कर दिए और उन्होंने अपने पर्स से ₹1500 निकाल कर बिल चुकता किया, मुझे घर आने का निमंत्रण भी दिया और अपनी जल्दी जाने की मजबूरी बताकर वहाँ से चली गईं। मेरी धर्मपत्नी जी इन सारी बातों पर गौर कर रहीं थीं।
जब हम दोनों सारी खरीददारी करके घर आये तो मेरी धर्मपत्नी जी ने कहा कि "तुम तो कहते थे कि ये भाभीजी बहुत समझदार हैं, पैसे वाली है, और दरियादिल भी हैं। लेकिन आज अपने ड्राइवर से तीनसौ रूपये उधार लिए उन्होंने। कम से कम घर से इतने रूपये तो लेकर चलने चाहिए कि किसी से माँगने की नौबत न आये।"
जवाब में मैंने कहा कि "वो चाहतीं तो उसी वक्त अपने डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड या अपने एक वाक्य से पूरी की पूरी दुकान खरीद सकतीं थीं। लेकिन ड्राइवर से तीनसौ रूपये माँगने के पीछे भी उनका एक लॉजिक था।"
"कैसा लॉजिक? भला कोई इतना अमीर होते हुए भी ड्राइवर से तीनसौ रूपये उधार माँगता है?" हमारी धर्मपत्नीजी अपना ख़रीदा हुआ सामान देखते हुए बोलीं, क्योंकि सारा पेमेंट उन्होंने ही किया था बिना मुझसे माँगे।
तब मैंने उनको बताया कि "अगर वो उस ड्रैस की पूरी कीमत खुद चुकातीं तो ड्राइवर के लिए वो एक फ्री की पोशाक होती और वो उसका कभी ख्याल नहीं रखता। लेकिन जब उसी पोशाक में उसके तीनसौ रूपये मिले हुए हैं तो वो उसका ख्याल रखेगा, हर दम रखेगा।"
मेरी शरीकेहयात मेरे इस जवाब से लाजवाब हो गईं और जब उन्होंने मुझसे पूछा कि तुम कैसे जानते हो ये बात ? जवाब में मैने केवल इतना कहा कि वो नीला ब्लेजर जिसको तुम मेरे जन्मदिन पर गिफ्ट बतौर खरीद कर लाईं थी उसको तुमने कभी घर पर नहीं धोया बल्कि बादबाकी तीन ब्लेजर जो मैंने ख़रीदे थे उनको तुम घर पर धो देती हो।
उन भाभीजी की हरकत की बाबत ये केवल मेरा अंदाजा है जो कि गलत नहीं हो सकता। इससे मैंने एक सीख और सीखी है कि जब भी मैं अपने बेटे को कोई खिलौना दिलवाऊंगा तो कुछ रूपये उसकी गुल्लक से निकाल कर दिलवाऊंगा, और बाद में उतने ही रूपये उसकी गुल्लक में डाल दूंगा। ताकि उसे अपने रुपयों की कीमत आज से ही पता चले। आप भी ऐसा कर सकते हो, इससे खिलौनों के टूटने की गति में थोड़ा ठहराव आएगा।
बादबाकी बड़े बूढ़े कहते हैं कि रूपये पर अनुभव भारी होता है तो सही ही कहते होंगे।
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