Thursday, 13 October 2016

#कैसीलगरहीहूँमैं?

इस वाक्य की भी महिमा अपरंपार है, खैर इस वाक्य की महिमा को जानने के लिए शब्द की महिमा समझनी पड़ेगी।

जहाँ लात और लाठी काम नहीं कर पाती वहां शब्द काम आते हैं।

ये जो प्रेमी नाम की कौम होती है न उनके पास सबसे ज्यादा शब्द होते हैं भले ही वो शब्द दोहराव झेलते हों अक्सर। खैर मैं खुद भी उत्सुक हूँ उन शब्दों को जानने के लिए, जिनके जेरेसाया हर 15 मिनट बाद  2 घण्टे तक बात होती रहती है।
इतने शब्द हैं कि मुझे गिनती भी नहीं मालूम लेकिन अभी एक शब्द के बारे में बता रहा हूँ अपनी स्टाइल में।

आप शादीशुदा हो, शाम को ऑफिस से आकर पता चला कि आज धर्मपत्नी जी को करवाचौथ की शॉपिंग करानी है और धर्मपत्नीजी कमरे में से सजकर निकलें; और आते ही आपसे पूछ लें कि,

केस 1-
"कैसी लग रही हूँ जी मैं?"
इस पर आपका जवाब हो कि 'हत्यारिन' लग रही हो। अब जनाब आपको शॉपिंग से लौटकर दोनों के लिए खुद खाना न परोसना पड़े तो कहना। अगली सुबह ऑफिस में लंच के समय लंच में लौकी न मिले तो कहना।

केस 2-

"कैसी लग रही हूँ जी मैं?"
इस पर आपका जवाब हो कि 'कातिल' लग रही हो। अब जनाब आपको शॉपिंग से लौटकर खाना परोसा हुआ मिलेगा और गर्म किया हुआ भी मिल सकता है। अगली सुबह ऑफिस में लंच के समय लंच में आपकी मनपसंद दाल या सब्ज़ी न मिले तो कहना।

केस 3-

"कैसी लग रही हूँ जी मैं?"
अब अगर इस पर आपका जवाब हो कि 'Killer' लग रही हो। अब जनाब शॉपिंग में आपसे पनीर खरीदने को भी कहा जायेगा, मटर तो घर पर मौजूद है। रात का खाना तो गर्म किया हुआ मिलना ही है। अगली सुबह ऑफिस में लंच के समय लंचबॉक्स में क्या मिलने वाला है वो तो आप जानते है ही हैं।

बादबाकी 'हत्यारिन', 'कातिल' और 'killer' का मतलब एक ही है। मुझे, ये बताने की जरूरत आपको तो नहीं पड़ेगी इतना मुझे विश्वाश है।

शब्दों में जान नहीं होती लेकिन शब्द प्रयोग में होती है।
लौकी खाओगे? मैं तो खा रहा हूँ।
गलती से ही अनुभव मिलता है।😊

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