Wednesday, 12 October 2016

#मिशनUP.
Must read.
(Share it if you like it)

कहानी तो काल्पनिक ही होती हैं लेकिन उनमें वास्तविकता का पुट डालना भी एक कला है जो मेरी माताजी को बखूबी आता है। इस कहानी को वो बचपन में इतनी बार सुना चुकी हैं कि अब तो शब्द-दर-शब्द रट चुकी है।

रामसेवक ने एक राम कथा कही और कहते ही वो प्रसिद्धि पा गए। कहने को तो उन्होंने ये रामकथा राम के होने के हजारों वर्षों बाद पुनः लिखी लेकिन इतनी खूब लिखी और उससे भी ज्यादा बखूब कही कि इसकी खबर देवताओं तक भी पहुँच गयी। खैर राम तो एक हुए हैं, लेकिन उनकी तो उतनी कहानी हो सकती हैं जितने कि लिखने वाले हैं और सुनाने वाले। लेकिन रामसेवक जी की कथा कुछ ऐसी थी कि तमाम देवताओं ने असल रामभक्त श्रीहनुमानजी को खबर दी कि श्रीराम की अक्षरशः कथा है तो तुम्हारे भी सुनने योग्य है। अब हनुमान तो प्रत्यक्षदर्शी थे कथा के, फिर भी रोज-रोज खबर आने लगी तो हनुमान चोरी से उस कथा को सुनने जाते थे जिसे रामसेवक सांझ ढले ही इकट्ठे हुए भक्तों के बीच सुनाते।

ये मात्र एक कहानी है, पर अर्थपूर्ण है और बहुत बार कहानियां सत्य से भी ज्यादा अर्थपूर्ण होती हैं।

इधर रामसेवकजी के मुखारबिन्द से राम की कथा चलती रहती और उधर हनुमान उस कथा का श्रवण कर हैरान रहते। वो हैरान इस बात से थे कि रामसेवक हजारों साल के बाद, कथा को ठीक वैसा कह रहे हैं, जैसी वह घटी थी। यह बड़ी कठिन बात है। जो आंख के सामने देखते हैं, वे भी ठीक वैसा ही वर्णन नहीं करते, जैसा घटता है। घटना में आंख सम्मिलित हो जाती है, दृष्टि प्रवेश कर जाती है और आँखों देखा झुठलाया नहीं जाता। लेकिन हजारों साल बाद एक आदमी कहानी कह रहा है और ठीक ऐसी कि हनुमान जैसा चश्मदीद भी कोई भूल-चूक नहीं निकाल पा रहा है। रामसेवक जी कहानी को ऐसे सुना रहे थे जैसे घटना उनके सामने ही घटित हुई हो।

लेकिन एक दिन जब रामसेवक जी कहानी सुना रहे थे तो हनुमान को एक प्रसंग में भूल मिल गई। तब हनुमान ने खड़े होकर कहा कि माफ करें, और सब तो ठीक है, इसमें थोढा-सा बदलाब कर लें। आप कह रहे हैं कि हनुमान जब अशोक वाटिका में गए, तो चारों तरफ श्वेत, चांद की चांदनी की तरह फूल खिले थे लेकिन यह बात गलत है क्योंकि हनुमान जब अशोक वाटिका में गए थे तब सुर्ख लाल फूल थे जो चारों ओर खिले थे और सफेद फूलों का वहां कोई अस्तित्व नहीं था।

वो चश्मदीद थे और उनकी बात सही थी। लेकिन रामसेवक ने कहा कि चुपचाप बैठ जाओ और बकवास मत करो। वहाँ सारे फूल सफेद थे।

अभी हनुमान अपने वास्तविक रूप में नहीं थे तो उन्होंने जाहिर होकर नहीं कहा था कि मैं हनुमान हूं। लेकिन उन्होंने फिर दोहराया कि महाशय, सुधार कर लें मैं किसी कारण से कह रहा हूं।

रामदास ने कहा, बीच में गड़बड़ मत करो। फूल सफेद थे। और चुपचाप बैठ जाओ। इतना सुनकर हनुमान को क्रोध आ गया। क्योंकि अगर आपकी देखी हुई बात को कोई आदमी झूठ कहे तो क्रोध आपको भी आएगा। अब वे तुरंत अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुए और बोले, "मैं खुद हनुमान हूं। अब बोलो तुम क्या कहते हो? फूल लाल थे। सुधार कर लो!"

रामसेवक ने कहा, "फिर भी कहता हूं कि चुपचाप बैठ जाओ और गड़बड़ मत करो। हनुमान हो तो अपने लिए लिए हो और बिना जाने श्रीरामकथा में विघ्न न डालो। अशोक वाटिका के सारे फूल सफेद थे।

अब बात बहुत उपद्रव की बात हो गई। कोई रास्ता न था, तो हनुमान रामसेवक को बीच कथा से उठाकर श्रीराम के पास ले गए और बोले कि प्रभु यह एक झूठा इंसान है जिसको मैं कह रहा हूं कि अशोक वाटिका के समस्त फूल लाल थे, लेकिन ये कह रहा है कि समस्त फूल सफेद थे। मैं हनुमान हूं और प्रत्यक्षदर्शी हूँ। हजारों साल बाद ये सज्जन कहानी कह रहे हैं लेकिन हद जिद्दी आदमी है जो मुझसे कहता है, चुपचाप बैठ जाओ क्योंकि फूल सफ़ेद ही थे। अब आप ही निर्णय दें।

तब श्रीराम ने कहा, हनुमान, तुम रामसेवक जी से तुरंत क्षमा मांग लो क्योंकि अशोक वाटिका में उस दिन समस्त फूल सफेद ही थे; रामदास ठीक ही कहते हैं।

हनुमान इतना सुनकर जड़ रह गए और बोले कि प्रभु मैंने अशोकवाटिका को उजाड़ा था और हर फूल और हर पेड़,-पौधे को दिन से देखा था लेकिन वहाँ सारे फ़ूल लाल थे और और आप मुझे ही झूठा घोषित किये दे रहे हो।

तब श्रीराम ने हनुमान को बताया कि हनुमान उस समय तुम इतने क्रोध में थे कि तुम्हारी आंखें खून से भरी थीं और उन क्रोध से भरी लाल आँखों से तुमको सारे फूल लाल ही दिखाई दिए थे लेकिन फूल सफेद ही थे।।


अब मियाँ थी तो ये कहानी जो भला संभव न हो, लेकिन खून से भरी लाल आंखों से सफेद फूल लाल दिखाई देंगे, यह संभव है।

कमोबेश ये कहानी उत्तर प्रदेश की जनता पर सटीक बैठ रही है। दस साल तक हाथी और साइकिल सवार सरकार ने उत्तरप्रदेश की जनता की आँखों को खून से भर दिया है अब लाल फूल दिखाई देना तो लाज़िमी है।

बादबाकी जो कहते हैं कि स्मार्टफोन के युग में कहानी कौन सुनाता है वो ये जान गए होंगे कि जिसने सुनी और पढ़ी हैं वो आज भी सुनाते हैं।

शुभरात्रि।

No comments:

Post a Comment